लंदन: शहीद ऊधम सिंह के बारे में यह बात काफी प्रचलित है कि उन्होंने लंदन की अदालत में चली कार्यवाही के दौरान वारिस शाह की रचना ‘हीर’ की कसम खाई थी। यह भी कहा जाता है कि ऊधम सिंह ने ऐसा अपनी धार्मिक पहचान को खारिज करने के लिए किया था। लेकिन अब सामने आए ऐतिहासिक दस्तावेजों से पता चलता है कि न सिर्फ ‘हीर’ की कसम खाने वाला दावा गलत है, बल्कि हकीकत यह है कि सरदार ऊधम सिंह ने मुकदमे के दौरान कोई कसम खाई ही नहीं थी।
कनाडा स्थित डॉक्यूमेंट्री फिल्ममेकर (दस्तावेजीकार) और शोधकर्ता सुखदीप सिंह बरनाला द्वारा बनाई गई डॉक्यूमेंट्री “नॉट गिल्टी” (Not Guilty) में ब्रिटिश लाइब्रेरी से प्राप्त दस्तावेजों के हवाले से यह बात सामने लाई गई है। पूरे मुकदमे की कार्यवाही के दौरान कुल 25 लोगों ने गवाही दी थी। इन 25 लोगों में से 24 लोगों ने अपनी गवाही देते समय कसम (Sworn) खाई थी, लेकिन एक व्यक्ति ने कसम खाने की जगह सच बोलने का संकल्प (Affirm) लिया था। वह एकमात्र व्यक्ति सरदार ऊधम सिंह थे।
पंजाब स्कूल शिक्षा बोर्ड की किताबों के दावे को सीधी चुनौती
सुखदीप सिंह बरनाला की यह नई शॉर्ट डॉक्यूमेंट्री ‘राइजिंग पंजाब’ (Rising Punjab) यूट्यूब चैनल पर रिलीज हुई है। यह डॉक्यूमेंट्री पंजाब स्कूल शिक्षा बोर्ड (PSEB) द्वारा पढ़ाई जा रही उस कहानी को सीधी टक्कर देती है, जिसमें दावा किया जाता है कि 1940 में लंदन की अदालत में पेशी के दौरान सरदार ऊधम सिंह ने वारिस शाह की ‘हीर’ पर हाथ रखकर कसम खाई थी।

एक जाली चिट्ठी से हुई थी इस झूठ की शुरुआत
डॉक्यूमेंट्री में सुखदीप सिंह बरनाला बताते हैं कि ऊधम सिंह द्वारा ‘हीर’ की कसम खाने की यह मनगढ़ंत कहानी एक जाली चिट्ठी से शुरू हुई, जो पहली बार 1973 में सामने आई थी। पूर्व राज्यसभा सांसद मनोहर सिंह गिल इस चिट्ठी को इंग्लैंड से लेकर आए थे। इसमें यह दावा किया गया था कि ऊधम सिंह ने लंदन की जेल से ‘हीर’ मंगवाई थी। लेकिन, इंग्लैंड के ‘ऊधम सिंह ट्रस्ट’ द्वारा करवाई गई फोरेंसिक जांच ने यह साबित कर दिया कि यह चिट्ठी पूरी तरह से नकली (जाली) थी।
इस जालसाजी के बावजूद, यह चिट्ठी 1974 में गुरु नानक देव यूनिवर्सिटी की इतिहास की किताबों का हिस्सा बन गई, और धीरे-धीरे यह झूठ पंजाब स्कूल शिक्षा बोर्ड की बारहवीं कक्षा की इतिहास की किताब तक पहुंच गया।
ऊधम सिंह ने ‘कसम’ नहीं खाई, बल्कि सच बोलने का ‘वचन’ दिया था
सुखदीप सिंह बरनाला बताते हैं कि इस डॉक्यूमेंट्री के लिए ‘राइजिंग पंजाब’ ने माइकल ओडवायर की हत्या के मुकदमे से जुड़े ब्रिटिश अभिलेखागार (Archives) तक विशेष पहुंच बनाकर यह सच सामने लाया कि लंदन की ओल्ड बेली अदालत में असल में क्या हुआ था।
रिकॉर्ड के मुताबिक, अदालत में पेश हुए 25 लोगों में से 24 ने कसम खाई थी। लेकिन 25वें व्यक्ति—सरदार ऊधम सिंह—ने किसी भी किताब पर हाथ रखकर कसम खाने से इनकार कर दिया था। इसके बजाय, उन्होंने कानूनी तौर पर सच बोलने का वचन (Affirmation) दिया था।
जब उनके बचाव पक्ष के वकील सेंट जॉन हचिंसन ने पूछा कि क्या वह कसम की जगह वचन देंगे, तो ऊधम सिंह ने जवाब दिया, “हां।” अदालत के आधिकारिक रिकॉर्ड में साफ लिखा है: ‘ऊधम सिंह, कैदी, ने वचन दिया (Udham Singh, Prisoner, affirmed)’। उन्होंने न ‘हीर’ की कसम खाई और न ही बाइबिल की।
सिख धर्म और सिद्धांतों से गहरा लगाव
यह डॉक्यूमेंट्री फिल्म उन इतिहासकारों की नीयत पर भी सवाल खड़े करती है जिन्होंने यह दावा किया था कि ऊधम सिंह ने अपनी धार्मिक पहचान को मिटाकर सेक्युलर (धर्मनिरपेक्ष) पहचान बनाने के लिए हीर की कसम खाई थी। इसके विपरीत, डॉक्यूमेंट्री यह प्रमाण पेश करती है कि ऊधम सिंह का सिख धर्म और सिख सिद्धांतों के प्रति गहरा लगाव था।

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42 दिनों की भूख हड़ताल: यह डॉक्यूमेंट्री ऊधम सिंह के सिख धर्म से लगाव का सबूत पेश करते हुए बताती है कि लंदन की जेल में बंद रहने के दौरान, जब जेल प्रशासन ने उन्हें स्नान करने और नितनेम (पाठ) करने की अनुमति नहीं दी, तो उन्होंने विरोध में 42 दिनों की लंबी भूख हड़ताल रखी थी।
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नितनेम के लिए गुटका साहिब की मांग: 14 जून 1940 की एक सरकारी चिट्ठी से पता चलता है कि जेल के एक अधिकारी ने लंदन के खालसा जत्था गुरुद्वारा साहिब के सचिव को सीधा पत्र लिखकर फांसी की सजा पाए इस कैदी के लिए “प्रेयर बुक” (गुटका साहिब) की मांग की थी।
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पर्चे पर लिखा “ੴ” (इक ओंकार): जो लोग यह दावा करते हैं कि ऊधम सिंह ने अपनी धार्मिक पहचान छोड़ दी थी, उन्हें झूठा साबित करते हुए यह फिल्म बताती है कि 5 जून 1940 को ऊधम सिंह ने जज की तरफ जो हाथ से लिखा हुआ पर्चा उछाला था, उसके बिल्कुल ऊपर सिख धर्म का मूल प्रतीक “ੴ” लिखा हुआ था।
