दो सदियों का अफगानिस्तान: साजिशें, हमले, तख्तापलट और विश्व शक्तियों की शमूलियत

19वीं सदी से लेकर अब तक अफगानिस्तान कभी भी पूरी तरह शांत नहीं रहा। पहले यह रूस और ब्रिटेन के बीच ‘ग्रेट गेम’ का केंद्र बना, फिर शीत युद्ध का अखाड़ा। इस लेख में हरप्रीत सिंह लौंगोवाल अफगानिस्तान में विदेशी हस्तक्षेप, आंतरिक गृहयुद्ध और सिखों के साथ इसके ऐतिहासिक संबंधों का विश्लेषण कर रहे हैं।

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19वीं सदी से लेकर अब तक अफगानिस्तान दुनिया की बड़ी ताकतों के लिए जंग का मैदान बनता आया है। रूस और ब्रिटेन के बीच युद्ध का मैदान बने रहने के बाद यह ‘गृहयुद्ध’ (सिविल वॉर) और फिर रूस और अमेरिका के बीच लड़ी जाने वाली ‘शीत युद्ध’ (कोल्ड वॉर) का केंद्र बना। रूस और अमेरिका आपस में सीधे मुकाबले में नहीं आए, लेकिन उन्होंने आपस में अफगानिस्तान के जरिए युद्ध लड़ा। इसके बाद भी यहाँ हालात कभी शांतिपूर्ण नहीं रहे। इन समयों में घटी किन घटनाओं ने अफगानिस्तान में युद्ध के हालात बनाए रखे, यह लेख इस बात को समझने की एक कोशिश है।

18वीं सदी में अफगानिस्तान पर दुर्रानियों का राज था। दुर्रानी बादशाह अहमद शाह अब्दाली (दुर्रानी) जैसों ने पड़ोसी मुल्कों हिंदुस्तान, ईरान और मध्य एशिया के इलाकों को जीतकर अफगानिस्तान कायम किया था। अहमद शाह दुर्रानी की मौत के बाद गद्दी पर बैठने के लिए उसके पुत्रों के बीच कई साल लड़ाई चलती रही। 19वीं सदी की शुरुआत में पठानों का बारकजई खानदान, दुर्रानी खानदान को हराकर काबुल का शाह बन गया। अफगानिस्तान में सदियों से ही मुस्लिम कबीलों का राज रहा था। ताकतवर कबीले दूसरे कबीलों के साथ सहमति करके काबुल पर काबिज हो जाते थे, जिन्हें ‘अमीर’ कहा जाता था। कई बार कबीले आपसी गृहयुद्ध में उलझ जाते थे। अफगानिस्तान के इलाके से अमीरों को बहुत आमदनी न होने के कारण अमीर अपने लिए अलग तौर पर फौज का इंतजाम नहीं कर सकते थे, बल्कि उनकी फौज का बड़ा हिस्सा कबीलों के सरदारों द्वारा भेजे गए लड़ाके नौजवान ही होते थे। हर कबीले में हथियारबंद सिपाहियों का दल होता था, जिसे अमीरों की तरफ से लड़ने पर आमदनी प्राप्त होती थी। मुख्य रूप से ये कबीले पठान, हजारा, बलोच, ताजिक, उज्बेक और तुर्कों के थे।

Ahmed Shah Durrani अहमद शाह दुर्रानी
अहमद शाह दुर्रानी

19वीं सदी में दुनिया की दो बड़ी ताकतों—रूस की ज़ारशाही (राजशाही) और अंग्रेजी (ब्रिटिश) साम्राज्य—के बीच दुनिया के बड़े हिस्से पर कब्जे को लेकर खींचतान चल रही थी। रूस का बादशाह उत्तर से दक्षिण की ओर बढ़ता हुआ मध्य एशिया (आज के कजाकिस्तान, उज्बेकिस्तान, किर्गिस्तान, तुर्कमेनिस्तान, ताजिकिस्तान) और अफगानिस्तान के इलाके की ओर आ रहा था। अंग्रेज हुकूमत ने रूस को आगे दक्षिण की ओर बढ़ने और हिंदुस्तान के विशाल क्षेत्र में दाखिल होने से रोकने के लिए बहुत सारी सैन्य और कूटनीतिक कोशिशें कीं। हिंदुस्तान का इलाका, जिस पर अंग्रेज राज कर रहे थे, इस बात से भली-भांति परिचित था कि इतिहास में सदियों से हमलावर और हुकूमतें हिंदुस्तान पर कब्जे को लेकर बढ़ती आई हैं और सदा उनका रास्ता अफगानिस्तान से होकर दर्रा खैबर के रास्ते पंजाब रहा है।

अंग्रेज, रूस को मध्य एशिया की ओर बढ़ता देख रहे थे और उन्हें डर था कि अफगानिस्तान से रूस, हिंदुस्तान की ओर हमला करके अंग्रेजी हुकूमत को किसी भी समय बड़ा झटका दे सकता है। रूसी फौज की थोड़ी सी कोशिश ही हिंदुस्तान से अंग्रेजों को बाहर करके अपनी सल्तनत में मिला सकती थी या दोनों साम्राज्यों की आपसी लड़ाई के समय रूस अफगानिस्तान में पक्का मोर्चा बनाकर वहां से लगातार अंग्रेज हुकूमत पर हमले जारी रख सकता था। अफगानिस्तान के कबीले आपसी एकता की कमी के कारण रूस को वहां काबिज होने से रोक नहीं सकते थे। अंग्रेजी हुकूमत आपसी गृहयुद्ध में उलझ रहे अफगान कबीलों की ताकत से भयभीत नहीं थी, बल्कि रूस की बड़ी सैन्य ताकत से भयभीत थी, जो धीरे-धीरे अफगानिस्तान की ओर बढ़ रही थी।

अफगानिस्तान को रूस के किसी भी प्रभाव में आने से रोकने के लिए अंग्रेज हुकूमत ने वहां लगातार सैन्य और कूटनीतिक दखलंदाजी बरकरार रखी। अंग्रेजी हुकूमत भी हिंदुस्तान से धीरे-धीरे पंजाब, सिंध और कश्मीर की सरकारों के साथ दोस्ताना संबंध कायम करके अफगानिस्तान की ओर बढ़ती आ रही थी। अंग्रेजों के बढ़ते कदमों को रूस भी शक की नजर से देखता था और अंग्रेजों को मध्य एशिया में व्यापार और सैन्य दखलंदाजी के पक्ष से अपने लिए अच्छा नहीं मान रहा था। दुनिया पर सरदारी की लड़ाई में रूस और अंग्रेजी हुकूमत बहुत बार छोटी-बड़ी घटनाओं में उलझी, पर सीधे तौर पर एक-दूसरे के विरुद्ध जंग में नहीं उतरी। इन कूटनीतियों और घटनाओं के दौर को अंग्रेजों ने ‘ग्रेट गेम’ (बड़ी खेल) और रूस द्वारा ‘टूर्नामेंट ऑफ शैडोज़’ (परछाइयों का खेल) कहा गया।

दुर्रानियों के पंजाब पर बार-बार हमले और अफगानिस्तान की सीमाएं पंजाब से जोड़ने की कोशिशों में मुगल सल्तनत के सूबे तबाह हो गए थे, पर सिख ताकतवर हो गए थे। सिख-अफगान लड़ाइयों में अफगान हारते रहे और पीछे हटते गए, पर सिख अफगानिस्तान की सरहद तक पहुंचने लग गए थे। मुस्लिम कबीलों के सदियों के कब्जे में रही और काबुल के अमीरों की सल्तनत का खास हिस्सा पेशावर की घाटी महाराजा रणजीत सिंह ने नौशेरा की जंग में अफगानों से छीन ली। यह पेशावर की घाटी, जिसकी अधिकतर आबादी उस समय और आज भी पठान है, अफगान अमीरों ने कई बार अपने प्रबंध के नीचे लेने की कोशिश की, पर आज तक यह घाटी काबुल के प्रबंध के नीचे नहीं आ सकी।

Jamroud Fourt
जमरौद का किला

सिख जरनैल हरि सिंह नलवा ने जमरौद नाम के एक गांव में अफगानिस्तान की तरफ से होने वाले किसी भी हमले को रोकने के मकसद से एक किला बनाकर पक्की फौज बिठा दी थी। काबुल के अमीर दोस्त मोहम्मद खान ने पेशावर की घाटी को वहां के कबीलों की मदद से ‘जिहाद’ का नारा देकर दोबारा कब्जे में लेने की कोशिश की थी, जिसमें वे असफल रहे थे, पर जरनैल हरि सिंह नलवा सख्त जख्मी होकर शहीदी प्राप्त कर गए थे। सिख राज के खत्म होने के बाद यह सारा इलाका अंग्रेजों के प्रबंध के नीचे आ गया।

यूरोप से कई आदमी महाराजा रणजीत सिंह की फौज में भर्ती थे, कुछ फौज की बड़ी पदवियों पर भी तैनात थे। इसीलिए महाराजा रणजीत सिंह को रूस और फ्रांस के जनरल नेपोलियन बोनापार्ट की बढ़ रही ताकत और दोनों ताकतों के अफगानिस्तान की ओर बढ़ने का पता लगा होगा। रूस का नीचे की ओर बढ़ना, यह भी एक कारण होगा कि अंग्रेजों द्वारा समझौते की पेशकश आने पर उन्होंने संधि कर ली। भले ही इस संधि का पंथ के अंदर से भी विरोध हुआ। अकाली बाबा फूला सिंह जी के इस संधि के खिलाफ जाने और महाराजा लाहौर से नाराज होने की बात इतिहास में आती है। अंग्रेजों के साथ संधि ने महाराजा लाहौर को मालवा का सतलुज से यमुना के बीच का इलाका अपने राज के नीचे करने से रोक दिया था और अंग्रेजी हुकूमत ने पंजाब को रूस के हमले की सूरत में ‘बफर स्टेट’ मान लिया था, जिसे कि बाहर से हमले की सूरत में अंग्रेजों द्वारा सैन्य मदद मुहैया करवाई जानी थी। यूरोपीय ताकतों के मुकाबले लड़ाई के समर्थ बनने और फौज को आधुनिक बनाने के मकसद से महाराजा ने लाहौर में एक टुकड़ी भी कायम की थी।

French General Napoleon Bonaparte
फ्रांसीसी जनरल: नेपोलियन बोनापार्ट

अफगानिस्तान के अमीर दोस्त मोहम्मद खान के काफी इलाके खालसा राज में आ गए थे। रूस और हिंदुस्तान में स्थित अंग्रेजी साम्राज्य की ताकत के बीच उसने अफगानिस्तान के बफर स्टेट के तौर पर काम करने की संभावना देखी और दोनों ताकतों के साथ तोलवे (संतुलित) संबंध कायम करके अपने लिए फायदेमंद सौदे की ताक रखी। अंग्रेजों के साथ संधि करने को वह इस बात पर राजी हुआ कि अंग्रेज, अफगानिस्तान का सिख राज के पास गया हुआ इलाका वापस करवा दें, उसकी महाराजा लाहौर के साथ सुलह करवा दें और महाराजा को पश्चिम की ओर और बढ़ने से रोक दें। अंग्रेजों ने दोस्त मोहम्मद को इस बात के लिए रजामंद करना चाहा कि वह पेशावर पर से अपना दावा छोड़ दे और रूसी बादशाह के राजदूतों के साथ कोई बातचीत न रखे। बदले में अंग्रेज, महाराजा लाहौर को पश्चिम की ओर और बढ़ने से रोक देंगे।

दोस्त मोहम्मद के लिखित इकरारनामा मांगने की सूरत में अंग्रेजों ने यह लिखित करने से इनकार कर दिया। दोस्त ने अंग्रेजों पर दबाव बनाने के लिए रूसी प्रतिनिधिमंडल से बातचीत भी शुरू कर ली थी। दोस्त मोहम्मद रूस की मदद से महाराजा लाहौर के साथ जंग करके अपने इलाके वापस लेना चाहता था और बदले में रूस की फौजों को अफगानिस्तान में से रास्ता दे सकता था। रूस के साथ दोस्त की यह बातचीत सिरे न चढ़ सकी और अंग्रेजों ने भी दोस्त को संधि करने के योग्य न समझा। दोस्त मोहम्मद के साथ बातचीत टूटने पर अंग्रेजों ने अपनी पसंद का अमीर काबुल में गद्दी पर बिठाने की बात सोची।

दुर्रानी खानदान का अमीर शाह शुजा खुद को गद्दी पर बिठाने के लिए लाहौर दरबार और अंग्रेजों के पास विनती कर चुका था, इसीलिए महाराजा लाहौर, अंग्रेज सरकार और शाह शुजा के बीच एक समझौता हुआ, जिसके तहत शाह शुजा को इस शर्त पर काबुल का अमीर बनाया जाएगा कि वह पेशावर पर अपना दावा नहीं करेगा, रूस के साथ नजदीकी नहीं बढ़ाएगा और अंग्रेज हुकूमत के साथ सहमति में रहेगा। अपनी पसंद का हाकिम लगाने के लिए 1838 में सिख और अंग्रेज दोनों ताकतों ने मिलकर काबुल पर हमला किया। कुछ समय बाद अंग्रेज गवर्नर ऑकलैंड ने लाहौर दरबार के साथ संधि तोड़ दी और खुद ही कार्रवाई करते हुए दोस्त मोहम्मद को गिरफ्तार कर लिया और शाह शुजा को काबुल का अमीर बना दिया गया।

संधि के मुताबिक अंग्रेजों ने कोई आठ हजार अंग्रेजी फौज अमीर शाह शुजा की मदद के लिए वहां छोड़कर बाकी फौज वापस बुला ली। अफगानी कबीलों के सरदार शाह शुजा की जगह दोस्त मोहम्मद को अधिक पसंद करते थे। शाह शुजा के खिलाफ बगावत पैदा होने के कारण अंग्रेजी फौज को वापस आना पड़ा। जब अंग्रेजों ने अधिक फौज और साथ में उनके परिवार भी भेजे तो अफगानी लोगों ने विरोध करते हुए इस सारी टुकड़ी को बेरहमी से कत्ल कर दिया। इस कत्लेआम में से सिर्फ एक अंग्रेज अफसर ही काबुल से वापस अंग्रेजी चौकी में जख्मी हालत में पहुंच सका था। दोस्त मोहम्मद खान ने दोबारा काबुल को अपने हाथ में किया और शाह शुजा को कत्ल कर दिया। अंग्रेजों ने गलती यह कर ली थी कि दोस्त मोहम्मद के चाहते हुए भी उसके साथ संधि नहीं की, बल्कि उन्होंने अयोग्य व्यक्ति को संधि के लिए चुन लिया, जिसकी अफगानी लोगों में जरा भी इज्जत नहीं थी। अब अंग्रेजों के संबंध अफगानिस्तान के साथ बिगड़ चुके थे। दोस्त मोहम्मद खान ने वापस गद्दी पर बैठते हुए अफगानिस्तान के ईरान और पश्चिम की ओर के इलाकों को दोबारा अपने अधिकार में किया। जब 1847 और 1848 में सिख और अंग्रेज फौजें आपस में लड़ रही थीं, तब भी दोस्त ने पेशावर पर कब्जे की कोशिश की थी। 1849 में सिख राज पर कब्जे के बाद अंग्रेज अफगानिस्तान तक आगे बढ़ गए। सन 1854 में दोस्त मोहम्मद के साथ दोबारा से अंग्रेजों की बातचीत शुरू हुई। सन 1857 में ईरान के खिलाफ दोस्त मोहम्मद की मदद के लिए अंग्रेजी सरकार ने अपनी सैन्य टुकड़ी को कंधार भी भेजा।

Anglo sikh war
एंग्लो-सिख युद्ध

अंतर्राष्ट्रीय हालात बदलने के कारण रूस और अंग्रेजी हुकूमत ने अफगानिस्तान को ‘बफर स्टेट’ मानने के समझौते पर हस्ताक्षर किए। अंग्रेजी हुकूमत ने अफगानिस्तान को अपनी सैन्य सुरक्षा के नीचे रखना मंजूर कर लिया और अफगानिस्तान को सैन्य और आर्थिक मदद देनी शुरू की। इस समय तक रूस और अंग्रेज भी अपना ध्यान यूरोप की ओर केंद्रित करने लग पड़े थे। यूरोप के हालात धीरे-धीरे पहले विश्व युद्ध की ओर बढ़ते जा रहे थे। सन 1875-1876 तक पहुंचते-पहुंचते अफगान अमीर और अंग्रेजों के संबंध फिर से बिगड़ने लग पड़े। रूस की ओर से अपना प्रभाव बढ़ाने के लिए एक प्रतिनिधिमंडल काबुल भेजा गया, जिस पर अंग्रेजी हुकूमत ने एतराज जताते हुए अपना प्रतिनिधिमंडल भी काबुल की ओर भेजा। पर अंग्रेजी प्रतिनिधिमंडल को खैबर दर्रे से काबुल अमीर द्वारा मोड़ दिया गया।

इस दूसरी अंग्रेज-अफगान लड़ाई में काबुल के नवाब शेर अली के विरुद्ध अंग्रेजों ने चालीस हजार फौज भेजी और काबुल को घेर लिया। काबुल का अमीर शेर अली तो रूस की तरफ भाग गया पर उसके पुत्र मोहम्मद याकूब ने अंग्रेजों के साथ संधि करते हुए अफगानिस्तान के विदेशी मामलों को अंग्रेजों के हाथ में दे दिया। बाद में मोहम्मद याकूब के साथ भी संबंध बिगड़ने पर अंग्रेजों ने अब्दुर रहमान को काबुल का अमीर बना दिया। अब्दुर रहमान ने पक्के तौर पर संधि की शर्तों को मान लिया और अंग्रेजों के साथ कोई बिगाड़ पैदा नहीं किए। अंग्रेजों ने भी काबुल से फौज वापस बुला ली। जब अफगानिस्तान के उत्तरी इलाकों की ओर रूसी फौज बढ़ी, तो संधि के तहत अंग्रेजों ने फौज भेजकर अफगानिस्तान में रूस की फौजों को दाखिल होने से रोक दिया।

काबुल अमीर अब्दुर रहमान ने अफगानिस्तान में अलग-अलग कबीलों को इकट्ठा करके शांति कायम की, कबीलों की बगावत को वह सख्ती से कुचलता रहा। उसने कबीलों की ताकत कम करने के लिए पठान आबादी को उजाड़कर और कबीलों में बसाया। डूरंड सरहद, उसके लिए इस बात से ठीक थी कि अफगानों में भारी पठान कबीलों की आबादी दो हिस्सों में बंट जाए और उसकी गद्दी को कबीलों की बगावत से खतरा न रहे। काबुल अमीर अब्दुर रहमान ने भले ही अंग्रेजी हुकूमत के खिलाफ कोई अड़चन खड़ी नहीं की, पर उसने अंग्रेजों द्वारा अफगानिस्तान के साथ हुई ज्यादतियों के बारे में अफगान जनता को जागरूक किया। अगला अमीर हबीबुल्लाह खान भी अंग्रेजों की नीतियों के खिलाफ बोलता रहा। ये बातें अफगानी जनता में पश्चिमी अंग्रेजी फलसफे के खिलाफ धार्मिक और राजनीतिक पक्ष से विरोधी भावना उजागर करने में सहायक हुईं।

पठान आबादी और पेशावर की घाटी वाले इलाके को दोबारा अफगानिस्तान के साथ जोड़ने के लिए अफगानों की अंग्रेजों के साथ सन 1919 तक कई बार लड़ाइयां हुईं। अंग्रेजों ने इस इलाके में काफी सारे छोटे-छोटे किले बनवाए। सन 1893 में काबुल के अमीर को मजबूर करके उन्होंने अफगानी इलाके और अंग्रेज इलाके में पक्की सरहद की निशानदेही करवाकर इसे अफगानिस्तान और अंग्रेजी हिंदुस्तान की सरहद के तौर पर लिखित करवा दिया, जिसे ‘डूरंड रेखा’ या ‘डूरंड सरहद’ कहा जाता है। यही सरहद अब अफगानिस्तान और पाकिस्तान की मानी जाती है।

इस सरहद ने पठान आबादी को दो हिस्सों में बांट दिया था। काबुल के अमीरों ने पूरा जोर लगाते हुए इस सरहद से अंदर आकर अंग्रेजों से यह इलाका बहुत बार छीनने की कोशिश की। अंग्रेजों ने हर बार कोशिश करके अफगान अमीरों को इस सरहद को पक्की सरहद मानने के लिए राजी किया। पर अफगान शासकों ने इस सरहद को कभी भी दिल से मंजूर नहीं किया था। पठान आबादी को दो हिस्सों में बांटने के कारण काबुल के शासक जहीर शाह ने इसे अफगानिस्तान की सरहद मानने से इनकार किया था। अंग्रेजों के हिंदुस्तान से जाने के बाद पाकिस्तान के साथ काबुल सरकार का डूरंड सरहद के मुद्दे पर एक बार युद्ध भी छिड़ गया था। डूरंड सरहद अब तक भी सिर्फ प्रबंध के तौर पर ही अलग है, इसे पक्के तौर पर बंद नहीं किया गया। पठान कबीले पाकिस्तान और अफगानिस्तान से इधर-उधर जाते रहते थे। अफगानिस्तान की सोवियत फौज के साथ लड़ाई और फिर अमेरिका के साथ जंग के समय भी लड़ाकों ने इस सरहद को पार करके पाकिस्तान में शरण ली।

First Afghan War
एंग्लो-अफगान युद्ध

सन 1907 में रूस के बादशाह ने पहली क्रांति के बाद लोकतांत्रिक संसद को जगह देनी शुरू की और अंग्रेजी हुकूमत के साथ ईरान और अफगानिस्तान के बीच किसी किस्म का प्रभाव न रखने के लिए संधि कर ली। पहले विश्व युद्ध में काबुल अमीर हबीबुल्लाह खान ने ऑटोमन (उस्मानिया) राज द्वारा जिहाद का न्योता दिए जाने के बाद भी जंग में हिस्सा नहीं लिया, पर तुर्की और जर्मनी से अफगानी फौज के लिए मदद प्राप्त की। जब पहला विश्व युद्ध खत्म हुआ तो काबुल के अगले अमीर अमानुल्लाह खान ने अंग्रेजों की हालत को कमजोर समझते हुए और हिंदुस्तान में अंग्रेजों का विरोध बढ़ता देखकर अफगानिस्तान के विदेशी मामलों को अपने हाथ में ले लिया और अफगानिस्तान की आजादी का ऐलान कर दिया। यह बात अंग्रेज और अफगानों के बीच तीसरी जंग का कारण बन गई।

सन 1919 की जंग के दौरान अमानुल्लाह खान ने पेशावर को अपने कब्जे में लेने की दोबारा से कोशिश की। अमानुल्लाह खान ने इस जंग में अफगान कबीलों की भी मदद ली, उन्हें हथियार और सैन्य प्रशिक्षण दिया गया और शाही फौज में भर्ती भी किया गया। अंग्रेज, अफगानी फौज को हराते हुए डूरंड सरहद पर आकर आगे बढ़ने से रुक गए, वे जताना चाहते थे कि यह सरहद पक्की सरहद है। अफगानिस्तान की आजादी की बात मान ली गई और विदेशी मामलों के हक अफगानिस्तान सरकार अमानुल्लाह खान को दे दिए गए। 1926 में अमानुल्लाह खान ने अपने आप को अफगानिस्तान का बादशाह घोषित कर दिया। अफगानिस्तान को आधुनिक राहों पर चलाते हुए उसने बहुत सारे सार्वजनिक बदलाव लाने शुरू किए। उसके बाद 1933 तक अफगानिस्तान में गद्दी पर बैठने के लिए बगावतें चलती रहीं और अफगानिस्तान के बादशाह बदलते रहे। 1933 में मोहम्मद जहीर खान अफगानिस्तान का बादशाह बना।

सन 1917 में रूस में बादशाह का तख्ता पलट करके ज़ार को हटा दिया गया और लेनिन की अगुवाई वाली कम्युनिस्ट सोवियत यूनियन सरकार कायम की गई। रूस में कम्युनिस्ट सरकार बनने से पूरी दुनिया में कार्ल मार्क्स की विचारधारा का प्रभाव बढ़ा। रूस ने अपनी क्रांति की तर्ज पर दुनिया में अपने सिद्धांत का प्रभाव बढ़ाने का यत्न किया। पहले रूस का बादशाह अपनी सल्तनत का प्रभाव बढ़ाने के लिए अफगानिस्तान पर कब्जा करना चाहता था। अब सोवियत यूनियन अपनी विचारधारा को दुनिया में फैलाने के मकसद के लिए अफगानिस्तान पर प्रभाव बढ़ाना चाहता था। अफगानिस्तान में भले ही अभी भी राजशाही चलती थी, फिर भी रूस ने अफगानिस्तान को आर्थिक मदद भेजना जारी रखा।

अफगानिस्तान के बादशाह मोहम्मद जहीर शाह ने भी दूसरे विश्व युद्ध में किसी तरह का हिस्सा नहीं लिया, पर वह इस ताक में रहा कि यदि अंग्रेज हुकूमत कमजोर हुई तो डूरंड सरहद को मिटाकर पठान आबादी को एक किया जाए। 1973 में उसके राजगद्दी से हटाए जाने तक उसने अफगानिस्तान की आम जनता को आधुनिकता की ओर ले जाने की कोशिश की। उसने काबुल में यूनिवर्सिटी खोली। इस्लामिक कद्रों-कीमतों की जगह पश्चिमी तर्ज पर सभ्यचार को बदला जाने लगा था। 1966 में उसने पश्चिमी तर्ज पर अफगानिस्तान में नया संविधान लागू करवाया। जिसमें औरतों को पढ़ाई और कामकाज में हिस्सेदारी के अधिकार दिए गए। लोगों को चुनावों के जरिए अपने नुमाइंदे चुनकर पार्लियामेंट में भेजने का हक दिया गया। यह प्रबंध तकरीबन ब्रिटेन के प्रबंध से मिलता-जुलता था, जहां बादशाह भी था और पार्लियामेंट भी थी। जहीर खान ने अफगानिस्तान में पक्की फौज की भर्ती की और जनता पर टैक्स लगाकर लगान वसूलना शुरू किया। पश्चिमी सभ्यचार और मुस्लिम रिवायतों के आपसी विरोध में उसे अफगान कबीलों की बगावतों का भी सामना करना पड़ा।

1947 में अंग्रेज हुकूमत के मध्य एशिया से चले जाने के बाद सोवियत यूनियन ने अफगानिस्तान में दोबारा से अपना प्रभाव बढ़ाना शुरू किया। अफगानिस्तान को दी जाने वाली आर्थिक मदद और पार्लियामेंट के बनने से मार्क्सवादी राहों पर चलने वाली पार्टी, ‘पीपुल्स डेमोक्रेटिक पार्टी’ अस्तित्व में आई। 1960-70 के समय पूरी दुनिया में कम्युनिस्ट क्रांतियाँ हो रही थीं। पर जहीर शाह ने कम्युनिस्ट पार्टी को दबाया नहीं, क्योंकि एक तो वह लोगों को चुनावों के हक दे चुका था, दूसरा सोवियत यूनियन और अफगानिस्तान के अच्छे संबंध बन गए थे। इस पार्टी का प्रभाव धीरे-धीरे लोगों और अफगानी फौज के अंदर भी बढ़ता गया। अफगानिस्तान सरकार के भी पाकिस्तान और ईरान के साथ संबंध बिगड़ गए थे, इसलिए अकेला सोवियत यूनियन ही ऐसा देश था, जिसके ऊपर सैन्य और आर्थिक पक्ष से अफगानिस्तान की निर्भरता बन गई थी।

सन 1973 में जहीर शाह को गद्दी से उतारकर दाऊद खान काबुल का प्रेसिडेंट बन गया। इसने कानून बनाकर एक पार्टी प्रबंध लागू कर दिया। पीपुल्स डेमोक्रेटिक पार्टी (कम्युनिस्ट पार्टी) द्वारा विरोध जताने पर दाऊद खान ने इसके सदस्यों को कत्ल करवाना शुरू कर दिया। मुस्लिम धार्मिक नेता भी इसकी कुछ नीतियों के कारण विरोध में उतर आए थे। अप्रैल 1978 में हथियारबंद कबीलों, पीपुल्स डेमोक्रेटिक पार्टी के सदस्यों और फौजी जरनैलों ने तख्ता पलट करते हुए दाऊद खान को गिरफ्तार करके कत्ल कर दिया। अफगानिस्तान का नया संविधान अस्तित्व में लाया गया, इसे गणतंत्र बनाकर नया प्रेसिडेंट मोहम्मद तराकी को बनाया गया।

मोहम्मद तराकी वाली कम्युनिस्ट सरकार ने अफगानिस्तान के अंदर धार्मिक गतिविधियों को सख्ती से बंद कर दिया। बड़ी तेजी के साथ ऐसे बदलाव किए जाने की वजह से मुस्लिम नेता इसके विरोध पर उतर आए और हथियारबंद बगावत फिर से शुरू हो गई। सदियों से मुस्लिम कबीलों ने कभी सोचा नहीं था कि देश का कोई हाकिम मस्जिदों और मुसलमानों के खिलाफ भी जा सकता है। मुस्लिम नेताओं ने कबीलों को न्योता दिया कि ‘रब को न मानने वाली’ सरकार को गिरा दिया जाए। लोगों से जबरन कर वसूलने और जायदाद को कम्युनिस्ट सोच के तहत अपने मातहत करने के विरोध में भी लोग सरकार के खिलाफ खड़े हो गए। जब कम्युनिस्ट सरकार को बचाना तराकी के लिए मुश्किल हो गया, तो उसने सोवियत यूनियन से बगावत को दबाने के लिए सीधी सैन्य दखलंदाजी के लिए मदद मांगी।

पीपुल्स पार्टी में भी दो हिस्से थे, जिनकी अपनी-अपनी सोच थी। मोहम्मद तराकी को हफीजुल्लाह अमीन ने कत्ल करवा दिया और खुद प्रेसिडेंट बन गया। अफगान सरकार द्वारा बार-बार बाहर से मदद की अपील पर पहले सोवियत यूनियन, अफगान सरकार को देश के अंदरूनी मामले खुद सुलझाने के लिए कहता रहा, पर बाद में दिसंबर 1979 में अफगानिस्तान में फौज भेज दी। जिससे अफगानिस्तान में सोवियत और अफगानों की 9 साल लंबी लड़ाई की शुरुआत हो गई।

अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर यह समय ‘शीत युद्ध’ (कोल्ड वॉर) का था, जिसमें अमेरिका और सोवियत यूनियन दुनिया में अपना-अपना प्रभाव बढ़ाने के लिए कोशिश कर रहे थे, जिसका आधार विचारधारात्मक माना जा सकता है। सोवियत यूनियन कम्युनिस्ट विचारधारा को दुनिया स्तर पर फैलाने की कोशिश कर रहा था, जिसके विरोध में अमेरिका और उसके सहयोगी देश अपनी भूमिका निभा रहे थे। दुनिया भर में मार्क्सवादी विचारधारा वाली सरकारें अस्तित्व में आ रही थीं। दूसरी तरफ अमेरिका पूंजीवाद का मुद्दई था। दूसरे पक्ष से यह लड़ाई दुनिया की सरदारी की भी थी, जिसे कि सोवियत सरकार द्वारा चुनौती मिल रही थी। वियतनाम में अमेरिका कम्युनिस्ट ताकतों के हाथों हार गया था, इसलिए यह भी कहा गया कि अमेरिका ने कूटनीति के तहत अफगानिस्तान की जंग में कूदने के लिए सोवियत सरकार को मजबूर कर दिया।

हफीजुल्लाह अमीन वाली अफगान सरकार ने सोवियत सरकार की जगह अपनी निर्भरता पाकिस्तान के जरिए अमेरिका पर बढ़ानी शुरू कर दी थी। यह भी एक कारण बना कि सोवियत सरकार ने बहुत तेजी के साथ काबुल पर हमला किया। हफीजुल्लाह अमीन को कत्ल कर दिया गया और सोवियत पक्ष का प्रेसिडेंट लगाया गया। सोवियत सरकार का अंदाजा था कि बगावत खत्म करके जल्दी ही शांति स्थापित हो जाएगी, पर यह गलत साबित हुआ। जिस समय सोवियत ने अफगानिस्तान में हमला किया, उस समय बहुत सारे अफगान ग्रुप सरकार के विरुद्ध देश के अलग-अलग हिस्सों में हथियारबंद लड़ाई लड़ रहे थे। सोवियत फौज ने पहले से ही चल रही हथियारबंद जंग में अपने आप को शामिल कर लिया।

सोवियत फौज और सोवियत सरकार की नीतियों से अफगानी लोग पहले ही परिचित थे। सोवियत यूनियन के कब्जे के साथ ही अफगानी लोगों की सीधी जंग सोवियत फौज के साथ होनी शुरू हो गई। मुस्लिम धार्मिक नेताओं ने इसे इस्लाम पर हमला बताकर जिहाद का नारा दिया। सोवियत विरुद्ध इस जंग में मुस्लिम जगत ने बढ़-चढ़कर हिस्सा लिया। पाकिस्तान ने भी यह अंदाजा लगाते हुए कि सोवियत फौजें पाकिस्तान के अंदर भी आ सकती हैं, अमेरिका और अन्य मुल्कों की मदद लेनी शुरू की और सोवियत को अफगानिस्तान के अंदर ही उलझाने के लिए अफगान लड़ाकों की मदद करनी शुरू की। जंग के दौरान प्रशिक्षण और दम लेने के लिए डूरंड सरहद से लड़ाके पाकिस्तान के अंदर रुकते रहे। अंदाजन अमेरिका ने भी इस जंग में अफगानों की मदद की; सैन्य, तकनीकी और आर्थिक मदद अफगान लड़ाकों को मुहैया करवाई गई। आखिर 1989 में सोवियत सरकार को अफगानिस्तान से फौज बुलानी पड़ी। अफगानों के साथ-साथ यह जीत अमेरिका और उसके सहयोगी देशों की भी थी, जिसका नतीजा हुआ कि सोवियत यूनियन कमजोर होकर टूट गया और अमेरिका फिर से दुनिया की बड़ी ताकत बन गया।

सोवियत सरकार ने अफगानिस्तान से सरकार के साथ यह संधि करते हुए वापसी कर दी कि सरकार को दी जाने वाली मदद जारी रखी जाएगी। सोवियत सरकार के जाते ही अफगान लड़ाकों ने सोवियत द्वारा स्थापित अफगानिस्तान सरकार के साथ लड़ना शुरू किया। यह गृहयुद्ध 3 साल, 1992 तक चलता रहा। तीन सालों तक अफगान लड़ाके और सरकार इलाकों पर अपने कब्जे को लेकर लड़ते रहे। जब लड़ाई रुकती नजर न आई तो अफगानी राजनीति में सरगर्म राजनीतिक पार्टियों ने अफगान लड़ाके ग्रुपों को अफगानिस्तान सरकार के साथ मिलकर और विभाग बांटकर सरकार बनाने के लिए न्योता दिया। पर लड़ाके अफगानिस्तान सरकार को गिराने के लिए अड़े हुए थे। अप्रैल 1992 में तीन बड़े लड़ाकू ग्रुपों ने इकट्ठे होकर काबुल शहर को चारों तरफ से घेर लिया और तेजी से शहर के अंदर कब्जा कर लिया। अफगानिस्तान सरकार के मुखिया मोहम्मद नजीबुल्लाह को मुल्क छोड़ने से रोक दिया गया।

सोवियत द्वारा स्थापित सरकार के साथ काफी सारे अफगान ग्रुपों की फौजें लड़ रही थीं, जिनके नीचे लड़ाकों की गिनती हजारों में थी। सरकार गिराने के बाद ये ग्रुप काबुल और अफगानिस्तान में अपनी सरकार बनाने के लिए आमने-सामने होने लगे। सभी लड़ने वाले पक्ष सिवाय एक पक्ष के, पेशावर में एक बैठक करके सरकार बनाने और विभाग बांटने में राजी हो गए थे। पर जब एक ग्रुप ने काबुल शहर के अंदर जाना शुरू कर दिया और दूसरों के साथ सहमति से इनकार कर दिया तो इनकी आपस में दोबारा से लड़ाई शुरू हो गई।

सन 1994 तक ग्रुप आपस में एकता करते और फिर अलग होते रहे। 1995 की शुरुआत में एक नया विद्यार्थी ग्रुप ‘तालिबान’ नाम के तहत ताकत में आया और इसने अफगानिस्तान के काफी ग्रुप अपने साथ मिला लिए। इस ग्रुप ने अफगानिस्तान के बड़े हिस्से पर कब्जा कर लिया और सितंबर 1996 में काबुल में दाखिल होकर सरकार कायम कर ली। जो ग्रुप तालिबान के साथ सहमत नहीं हुए, उन्होंने आपस में इकट्ठे होकर अलग धड़ा ‘उत्तरी गठबंधन’ (नॉर्दन अलायंस) कायम कर लिया। उत्तरी गठबंधन अफगानिस्तान के उत्तर वाले हिस्से में काबिज रहा, और दोनों धड़े आने वाले कई सालों तक आपस में लड़ते रहे। जब तक कि अमेरिका और इसके साथी देशों ने 2001 में ओसामा को गिरफ्तार करने की बात कहकर तालिबान पर उत्तरी गठबंधन गुट की मदद से हमला नहीं कर दिया। अमेरिका और तालिबान की लड़ाई ने अगले 20 सालों तक अफगानिस्तान में अशांति बनाए रखी।