लेखक: परमजीत सिंह गाज़ी (संपादक, सिख सियासत)
सिख रेफरेंस लाइब्रेरी (Sikh Reference Library) का अनसुलझा मुद्दा एक बार फिर चर्चा में आ गया है। 12 मार्च, 2026 को राज्यसभा सांसद सतनाम सिंह संधू ने भारतीय संसद में प्रश्नकाल के दौरान इस मुद्दे को से उठाया। उन्होंने इस लाइब्रेरी के ऐतिहासिक महत्व ज़िक्र करते हुए मांग की कि सिख रेफरेंस लाइब्रेरी से गायब हुए दुर्लभ सिख ग्रंथों, पांडुलिपियों और हस्तलिखित पावन स्वरूपों को तुरंत वापस लाया जाए।
इसके जवाब में, केंद्रीय संस्कृति मंत्री गजेंद्र सिंह शेखावत ने लाइब्रेरी को हुए नुकसान को एक बेहद ‘दुर्भाग्यपूर्ण घटना’ करार दिया। उन्होंने कहा कि केंद्र सरकार ‘ज्ञान भारतम मिशन’ (Gyan Bharatam Mission) के तहत क्षतिग्रस्त सिख साहित्य को डिजिटल रूप से बहाल करने की संभावनाओं तलाशेगी और इस पहल को आगे बढ़ाने के लिए सांसद के साथ आगे की चर्चा करेगी।
इस घोषणा पर सिख संगठनों की प्रतिक्रिया का इंतजार है, खासकर सिखों और केंद्र सरकार के बीच गहरे अविश्वास को देखते हुए। सिख हलकों में कई लोगों का लंबे समय से यह मानना रहा है कि सिख ऐतिहासिक स्रोतों और पवित्र लेखों को जब्त करने और संभावित रूप से उनके साथ छेड़छाड़ करने के इरादे से सिख रेफरेंस लाइब्रेरी को सुनियोजित तरीके से लूटा गया था।
सिख इतिहास का एक अमूल्य खजाना
इस अपूरणीय संस्था की नींव 10 फरवरी, 1945 को अमृतसर के खालसा कॉलेज में प्रमुख विद्वानों की एक बैठक में रखी गई थी। इस महत्वपूर्ण बैठक का नेतृत्व राजकुमारी बंबा सदरलैंड ने किया था— शेरे-पंजाब सरकार रणजीत सिंह की पोत्री व दलीप सिंह की बेटी एवं शेरे-पंजाब के परिवार की अंतिम जीवित सदस्य थीं। नवगठित सिख हिस्टोरिकल सोसाइटी की मानद अध्यक्ष के रूप में राजकुमारी बंबा सदरलैंड दूरदर्शी नेतृत्व में, खालसा कॉलेज में “सेंट्रल सिख लाइब्रेरी” की स्थापना की गई।
27 अक्टूबर, 1946 को शिरोमणि गुरुद्वारा प्रबंधक कमेटी (SGPC) ने आधिकारिक तौर पर इस संग्रह को नवगठित “सिख रेफरेंस लाइब्रेरी” में एकीकृत करने का प्रस्ताव पारित किया। शुरुआत में गुरु राम दास निवास से संचालित होने वाली इस लाइब्रेरी और इसके तेजी से बढ़ते अभिलेखागार को 1953 में पवित्र श्री दरबार साहिब परिसर के भीतर एक नवनिर्मित भवन में स्थानांतरित कर दिया गया था।
यह सिखों की संस्थागत स्मृति और आध्यात्मिक स्रोतों का भंडार था। 1984 से पहले, इसमें अनुमानित 20,000 साहित्यिक कृतियाँ थीं, जिनमें 12,000 से अधिक दुर्लभ पुस्तकें और लगभग 2,500 अमूल्य हस्तलिखित पांडुलिपियाँ शामिल थीं। इसके अभिलेखागार में श्री गुरु ग्रंथ साहिब के हस्तलिखित स्वरूप—जिसमें श्रद्धेय दमदमी बीड़ भी शामिल है—के साथ-साथ सिख गुरुओं के वास्तविक हस्ताक्षरों वाले 20 से 25 हस्तलिखित हुकमनामे शमिल थे। इस लाइब्रेरी ने क्षेत्र के व्यापक इतिहास का भी दस्तावेजीकरण किया था, जिसमें गुरु नानक देव जी के युग से लेकर आगे की सिख यात्रा का वर्णन करने वाला अद्वितीय साहित्य मौजूद था।
जून 1984 में ‘ज्ञान्स्रोत-संहार‘ (Libricide) और विनाश
जून 1984 में भारतीय सेना द्वारा लगभग 70 सिख गुरुद्वारों पर किए गए हमले को भारत सरकार और सेना द्वारा “ऑपरेशन ब्लू स्टार” नाम दिया गया था, लेकिन सिख इसे ‘तीजा घल्लूघारा’ (holocaust) मानते हैं।
इस घल्लूघारे के दौरान टैंकों की गोलाबारी से श्री अकाल तख्त साहिब की इमारत को भारी नुकसान पहुंचा था। हालाँकि, यह त्रासदी मानव जीवन और भौतिक बुनियादी ढांचे के नुकसान के साथ-साथ ज्ञान्स्रोत-संहार (Libricide) के दायरे तक फैली हुई थी—जो किसी समुदाय के ज्ञान, इतिहास और सांस्कृतिक पहचान के स्रोतों का जानबूझकर और व्यवस्थित रूप से किया गया विनाश है।
इंडियन स्टेट के आधिकारिक श्वेत पत्र (White Paper) में दावा किया गया था कि 5 जून को गोलीबारी के दौरान लाइब्रेरी में आग लग गई थी। हालाँकि, सिख समुदाय इस नैरेटिव को रद्द करता है। उस समय लाइब्रेरी के प्रभारी सरदार देविंदर सिंह दुग्गल और पूर्व शिरोमणि कमेटी सचिव मंजीत सिंह कलकत्ता के अनुसार, 6 जून की शाम तक मुख्य लड़ाई समाप्त होने के बाद भी सिख रेफरेंस लाइब्रेरी पूरी तरह से सुरक्षित थी।
प्रत्यक्षदर्शियों के विवरण और पूर्व सीबीआई (CBI) अंदरूनी सूत्रों के बाद के खुलासों से पता चला कि राज्य तंत्र ने ऐतिहासिक पांडुलिपियों की सावधानीपूर्वक जांच की, उन्हें नंबर वाली बोरियों में पैक किया, और सैन्य वाहनों में अमृतसर के अस्थायी कार्यालयों में ले गए। कहा जाता है कि यह 7 जून को हुआ था, जब अमूल्य साहित्य को लूटने के बाद, खाली सिख रेफरेंस लाइब्रेरी को जानबूझकर आग के हवाले कर दिया गया। सिख लोगों के लिए, यह एक सुनियोजित ‘ज्ञान्स्रोत-संहार’ (Libricide) था जिसे उनके ऐतिहासिक पदचिह्नों को मिटाने और उनकी जड़ों से उनके संबंध को तोड़ने के लिए डिज़ाइन किया गया था।
सिख संस्थाओं का दशकों लंबा संघर्ष
जून 1984 के घल्लूघारे के बाद के दशकों में, सिख संगठनों, मुख्य रूप से शिरोमणि कमेटी, के साथ-साथ कई विद्वानों और राजनीतिक नेताओं ने इस मुद्दे को लगातार जीवित रखा है। उन्होंने चोरी हुई बौद्धिक और आध्यात्मिक विरासत की वापसी के लिए निरंतर अभियान चलाया है। पत्राचार, प्रस्तावों और कानूनी रास्तों (जिसमें 2004 का पंजाब और हरियाणा उच्च न्यायालय का वह आदेश भी शामिल है जिसमें और सरकार को जब्त की गई सामग्री वापस करने का निर्देश दिया गया था) के माध्यम से सिख संस्थाओं ने अथक रूप से जवाबदेही और अपने पवित्र ग्रंथों की वापसी की मांग की है।
खोखले आश्वासन और विवाद
इन अथक प्रयासों के बावजूद, इस संघर्ष को विरोधाभासी बयानों और अधूरे वादों का ही सामना करना पड़ा है। विभिन्न केंद्र सरकारों ने अलग-अलग समय पर आश्वासन दिए हैं, फिर भी कभी कोई ठोस परिणाम सामने नहीं आया।
पिछले कुछ वर्षों में, राज्य एजेंसियों ने अस्थिर दावे किए हैं कि या तो सभी सामग्रियां जलकर राख हो गईं, या फिर वस्तुएं पहले ही शिरोमणि कमेटी को वापस कर दी गई थीं। दुखद बात यह है कि इस मामले को संभालने के लिए शिरोमणि कमेटी को भी सिख हलकों के भीतर आलोचना का सामना करना पड़ा है, क्योंकि वह एक पारदर्शी और निश्चित सूची (Inventory) प्रकाशित करने में विफल रही है जो इन विवादित ‘वापसी’ के दावों को हमेशा के लिए शांत कर सके।
एक सतर्क प्रतीक्षा: तकनीकी आश्वासन और स्थायी अविश्वास
यद्यपि आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) और डिजिटल बहाली को लेकर हालिया संसदीय चर्चा इस विषय को फिर से विमर्श के मंच पर लाती है, लेकिन सिख समुदाय गहराई से संशय में है। चालीस से अधिक वर्षों से, खोखले आश्वासन एक चुराई गई विरासत के खुले घाव को भरने में विफल रहे हैं।
हालाँकि यह अत्यंत आवश्यक है कि बची हुई पांडुलिपियों, हुकमनामों और पवित्र स्वरूपों का पारदर्शी तरीके से हिसाब दिया जाए और उन्हें सम्मानपूर्वक खालसा पंथ को वापस किया जाए, लेकिन सिख रेफरेंस लाइब्रेरी का यह ज्ञान्स्रोत-संहार (Libricide) हमेशा सिख ज्ञान-मीमांसा के मूलभूत स्रोतों को मिटाने के एक व्यवस्थित अभियान के स्थायी प्रतीक के रूप में खड़ा रहेगा।
