दशमेश पिता गुरु गोबिंद सिंह जी का दीना आगमन

गुरु गोबिंद सिंह जी दीना गाँव में कैसे पहुंचे और भाई रूप चंद ने अपने पुत्रों को गुरु सेवा में कैसे समर्पित किया? पढ़ें ज्ञानी गुरदित्त सिंह की कलम से यह भावुक ऐतिहासिक साखी।

Gurdwara Lohgarh Sahib, Dina, Moga गुरु गोबिंद सिंह जी

दीना से पांच कोस दूर भाई रूपा गाँव है। वहां खबर पहुंची कि दशमेश पिता गुरु गोबिंद सिंह जी दीना पहुंचे हुए हैं, तो भाई रूप चंद जी ने पूरे परिवार सहित दर्शनों के लिए पहुंचने की तैयारी की। खास-खास वस्तुएं जो सतगुरुओं के निमित्त तैयार की हुई थीं, वे भेंट करने के लिए साथ ले लीं। जिनमें भाई रूप चंद जी के परिवार की ओर से बारीक-बारीक सूत कातकर बड़े चाव (रीझ) से बनाई हुई एक सफेद पोशाक भी थी। यह भेंट करके सतगुरुओं से विनती की, “आप जी सारे नीले वस्त्र उतारकर यह सफेद पोशाक पहन लें।” सतगुरु जी ने बड़े प्रेम सहित इसे स्वीकार किया।

जितने छठे सतगुरु जी के समय के शस्त्र-वस्त्र थे, गुरु साहिबान की निशानियां, गुरु के महलों (परिवार) की निशानियां और गुरु के सिखों की वस्त्र-निशानियां थीं, वे भी साथ ले आए और भेंट करके विनती की कि यह सब श्री गुरु हरिगबिंद साहिब जी की खुशियां हैं। इन्हें भी स्वीकार करें। गुरु जी ने उन्हें अपने शीश पर रखकर भाई रूप चंद जी को ही बख्श (लौटा) दीं।

श्री गुरु हरिगबिंद साहिब जी के जो दो घोड़े ‘दिलबाग’ और ‘गुलबाग’ भाई बिधी चंद जी लाए थे, उनमें से एक की संतान का घोड़ा पेश किया, जिसे बहुत लाड़-प्यार से पाला था। इस बछड़े को गुरु को अर्पण करने के लिए बचपन से ही मक्खन, मिश्री, बादाम, दूध आदि की खुराक दी जाती रही थी। गुरु जी के आगे एक घोड़ा पेश किया, जिससे प्रसन्न होकर गुरु जी ने और खुशियां बख्शीं। बड़ी बात यह है कि भाई रूप चंद जी ने अपने दो पुत्र—धरम चंद और परम चंद, सतगुरु जी के अंगरक्षक के रूप में सेवा करने के लिए पेश किए, जिन्होंने दीना से श्री हजूर साहिब तक गुरु जी का साथ दिया।

इस समय गुरु जी गाँव दीना में, देसू बढ़ई (तरखाण) के चौबारे में निवास करते रहे और भाई रूपा वाले तरफ जंगल में जाकर ‘जफरनामे’ की रचना की। यह जंगल का वही स्थान था जहां पहले श्री गुरु हरिगबिंद साहिब जी भी रवायतों के अनुसार शिकार खेलते और कमरकस खोलते थे। श्री गुरु जी के लिए भाई रूप चंद (सिंह) जी नित्य-प्रति भाई रूपा से लंगर तैयार करके, जहां भी गुरु साहिब विराजमान होते, उन्हें भोजन (प्रशादा) छका आते।

एक दिन भाई रूपा (गाँव) में चरण डालने की विनती की तो सतगुरु जी ने उन्हें निवाजा (मान दिया)। शिकार का बहाना बनाकर गाँव के पास ही भोजन छका और वचन-विलास किए। इस स्थान पर एक सरोवर है, जिसे ‘मानसरोवर’ कहा जाता है। भाई रूप चंद जी और उनके पोते भाई दुन्ना जी और भाई सुंदर जी, गुरु साहिब और गुरु की फौजों को भोजन छकाते थे।

यहाँ से फौजों के निराश लौट जाने पर गुरु जी, लक्खी जंगल के कई गाँवों से होते हुए तलवंडी साबो पहुंचे। यहां इस इलाके के सरदार “डल्ले चौधरी” ने गुरु जी के निवास के लिए हर तरह का प्रबंध किया। गुरु जी का पीछा करते सरहिंद के सूबे के आदमियों को ऐसे जवाब दिए, जिससे एक श्रद्धालु की ऊंची भक्ति और दृढ़ इरादे का पता चलता है। तलवंडी साबो में गुरु जी ने अमृत-संचार के यज्ञ रचे और श्री गुरु ग्रंथ साहिब की ‘दमदमी बीड़’ का स्वरूप तैयार किया। श्री गुरु गोबिंद सिंह जी ने ४८ सिंहों को श्री गुरु ग्रंथ साहिब जी के अर्थ सुनाए, जिनमें भाई धरम सिंह और भाई परम सिंह जी भी थे।

वैसे तो दीना से ही भाई रूप चंद जी ने दशमेश जी के साथ अपने दो पुत्र—धरम चंद और परम चंद सेवा में लगाए हुए थे, जहां भाई रूप चंद के सारे परिवार ने अमृत छका था; परंतु दमदमा साहिब निवास के समय, भाई रूप चंद, दमदमा साहिब से बहुत दूर नहीं थे, वहां पहुंचकर सतगुरुओं के दर्शन-मेले भी करते रहे और अपने परिवार की ओर से सेवा भी करते रहे। जिन वस्तुओं की आवश्यकता पड़ती रही, वे भेजते रहे। भाई रूपा वालों के पास एक लिखित रुक्का (पत्र) था, जिसमें दूध के लिए गाएं मंगवाने का जिक्र था। यह लिखित रुक्का वहां की संगत में पुराने लोग पढ़कर सुनाते रहे थे।

शिरोमणि गुरुद्वारा प्रबंधक कमेटी द्वारा छापे गए हुक्मनामों में भाई रूप चंद के परिवार के प्रति भरोसा और उनके घर को अपना समझने वाले वाक्य, बताते हैं कि श्री गुरु गोबिंद सिंह जी का इस घर के प्रति अटूट विश्वास था। दक्षिण जाते समय श्री गुरु गोबिंद सिंह जी को जो शामियाना आदि चाहिए था, संवत १७६३, कार्तिक के लिखे हुक्मनामे में उसका वर्णन है।

भाई रूप चंद ने शामियाना भी भेजा और साथ में अपने दो पुत्र भी, जो पहले ही गुरु जी के संग-साथ रहते थे, भेजे। प्राचीन साखी में जिक्र आता है कि दक्षिण जाते समय जहां श्री गुरु जी ने निवास करना होता था, वहां ये दोनों पहले पहुंचकर, पास के पेड़ों में से चारों ओर चारपाइयों के पायों की तरह, घास के पूले (सुब्ब) बांधकर, थोड़े समय में ही गुरु जी के विश्राम के लिए अनोखी किस्म का पलंग तैयार कर देते थे।

गुरु जी ने इन प्रेमी सिखों की मेहनत (घालणा) देखकर रास्ते में से कुछ वस्तुएं इन्हें सौंपकर वापस भेज दिया। वस्तुओं का विवरण—एक पाठ की पुस्तक, एक तलवार, एक कर्दम (छोटी छुरी) और एक छोटा खंडा बख्शे। भाई धरम सिंह और परम सिंह भाई रूपा पहुंचे, उस समय भाई रूप चंद जी वृद्ध शरीर में थे। उन्होंने अपने पुत्रों पर नाराजगी जताई कि, “तुम रास्ते में से क्यों मुड़ आए हो? जाओ, गुरु जी के संग-साथ ही रहो।”

पिता का हुक्म सुनकर दोनों भाई फिर गुरु जी के पास पहुंचे। इस समय दशमेश जी आगरा में बहादुर शाह के पास रुककर, इसके बाद बुरहानपुर होते हुए नांदेड़ जा ठहरे।

नांदेड़ में सतगुरुओं के ज्योति-जोत समाने के बाद दोनों भाई वापस भाई रूपा पहुंचे। उन्हें भाई रूप चंद ने सतगुरुओं की खबर-सार पूछी तो उन्होंने आंसुओं की झड़ी में अकाल-चलाणा कर जाने की खबर सुनाई। खबर सुनकर भाई रूप चंद जी ने लंबी आह भरी। उस दिन से आप जी बहुत समय एकांत में रहते हुए समाधि में बिताने लगे। कुछ लिखतों के मुताबिक संवत १७६६ सावन को पांच भौतिक शरीर त्यागकर गुरु चरणों में जा विराजे।

एक संकल्प भी आप जी के चलाने (देहांत) से पहले किया बताया जाता है कि उनकी देह का संस्कार वहां किया जाए, जहां उनकी गायों के झुंड (वग) एक ढाब (तालाब) पर पेड़ों के नीचे रहते हैं।

(पुस्तक ‘भाई रूप चंद और उनका वंश’ में से धन्यवाद सहित)।