पाकिस्तान की मध्यस्थता में अमेरिका और ईरान के बीच हुए दो सप्ताह के युद्धविराम की व्यापक रूप से सराहना की जा रही है क्योंकि इसने ईरान पर मंडरा रहे अमेरिका-इजरायल युद्ध को एक खतरनाक खाई के किनारे से वापस खींच लिया है।
जाहिर है, जब युद्ध क्रमिक वृद्धि के चरण में था, तब दुश्मनी के इस अचानक रुकने ने दुनिया को चौंका दिया है। दोनों युद्धरत पक्षों ने इस युद्धविराम को अपनी जीत के रूप में पेश किया है।
अमेरिकी प्रचारक (स्पिन डॉक्टर) मंगलवार को सोशल मीडिया पर ट्रंप के एक धमकी भरे संदेश का दावा कर रहे हैं, जिसमें उन्होंने धमकी दी थी, “आज रात एक पूरी सभ्यता नष्ट हो जाएगी, जिसे फिर कभी वापस नहीं लाया जा सकेगा।”
हालाँकि, इस युद्धविराम में जो दिख रहा है, उससे कहीं अधिक बातें छिपी हैं। ईरान के विदेश मंत्री अब्बास अरागची के बयान का विवरण यह बताता है कि यह युद्धविराम ईरान के लिए एक रणनीतिक जीत है।
युद्धविराम की शर्तों ने न केवल होर्मुज जलडमरूमध्य (स्ट्रेट ऑफ होर्मुज) पर ईरानी नियंत्रण को वैध बना दिया है, बल्कि आगामी वार्ताओं को भी निर्णायक रूप से ईरान के पक्ष में झुका दिया है।
अरागची ने स्पष्ट रूप से कहा है कि होर्मुज जलडमरूमध्य पर ईरानी नियंत्रण युद्धविराम के लिए एक महत्वपूर्ण शर्त है। उन्होंने कहा, “दो सप्ताह की अवधि के लिए, होर्मुज जलडमरूमध्य के माध्यम से सुरक्षित मार्ग ईरान के सशस्त्र बलों के साथ समन्वय और तकनीकी सीमाओं पर उचित विचार के बाद ही संभव होगा।”
यह बयान न केवल पश्चिमी एशियाई खाड़ी क्षेत्र में ईरानी स्थिति को मजबूत करता है, बल्कि ईरान पर अमेरिका के नेतृत्व वाले प्रतिबंध शासन को कमजोर करने में भी काफी मददगार साबित होगा।
युद्धविराम के दौरान होर्मुज जलडमरूमध्य पर ईरानी नियंत्रण का दावा पश्चिमी एशिया में ईरान और अमेरिका के बीच बदले हुए सत्ता समीकरण को रेखांकित करता है। बातचीत की दिशा तय करने में अमेरिकी सैन्य शक्ति की घटती प्रभावशीलता के साथ, यह निष्कर्ष निकालना उचित है कि युद्ध के बाद के समझौते में जलडमरूमध्य पर ईरानी रुख को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता है। खाड़ी देशों और इजरायल को एक पुनर्जीवित ईरान की वास्तविकता तथा पश्चिम एशिया में ईरान, रूस और चीन की धुरी के उदय के साथ जीना होगा।
होर्मुज जलडमरूमध्य पर ईरानी नियंत्रण एशियाई और यूरोपीय अर्थव्यवस्थाओं को प्रभावित करने, ईरान के साथ व्यापारिक संबंधों को फिर से शुरू करने या उनकी ऊर्जा सुरक्षा को खतरे में डालने के जोखिम के लिए एक महत्वपूर्ण उपकरण होगा।
कूटनीतिक मोर्चे पर भी ईरान ने एक विशिष्ट रणनीतिक लाभ हासिल किया है। यह एक सर्वविदित तथ्य है कि बातचीत की शर्तों का परिणाम पर महत्वपूर्ण प्रभाव पड़ता है। इस पृष्ठभूमि में अमेरिका के साथ अपनी बातचीत की शर्तें तय करने में ईरानी सफलता निर्णायक है। यह पूरी तरह से आकस्मिक नहीं है कि श्री अब्बास अरागची ने स्पष्ट रूप से कहा कि दो सप्ताह के युद्धविराम की स्वीकृति ट्रंप द्वारा “बातचीत के आधार के रूप में ईरान के 10-सूत्रीय प्रस्ताव के सामान्य ढांचे” की स्वीकृति पर निर्भर थी।
अमेरिका-इजरायल गठबंधन के साथ इस टकराव में ईरानी सफलताएं सैन्य, आर्थिक और कूटनीतिक रूप से असममित जुड़ाव (असिमेट्रिक एंगेजमेंट) का प्रदर्शन हैं। आर्थिक और सैन्य रूप से शक्तिशाली पश्चिम द्वारा चुनौती दिए जाने पर अपनी कमजोरी को ताकत में कैसे बदला जाए, इस पर ईरानी पैंतरेबाज़ी ‘ग्लोबल साउथ’ (वैश्विक दक्षिण) के देशों के लिए एक प्रामाणिक मार्गदर्शक है।
• कुमार संजय सिंह दिल्ली विश्वविद्यालय के स्वामी श्रद्धानंद कॉलेज के इतिहास विभाग में सह-प्राध्यापक (एसोसिएट प्रोफेसर) हैं।
