सिखों की दिल्ली फतह 1783: जब सिखों ने दिल्ली जीतकर नया इतिहास रचा

जानिए उस ऐतिहासिक दिन की गौरवगाथा जब 1783 ई. में महान सिख योद्धाओं—सरदार बघेल सिंह, जस्सा सिंह आहलूवालिया और जस्सा सिंह रामगढ़िया—ने दिल्ली पर आक्रमण कर मुगलों के लाल किले पर अपना केसरी परचम लहराया और एक नया इतिहास रचा था।

Baba Baghel Singh - Sikh Misls victory for Lal Quila Red Fort of Delhi 1783

मुगल काल में शाहजहां के बाद दिल्ली का लाल किला मुगल बादशाहों का मुख्य केंद्र था। साम्राज्य के कमजोर पड़ते ही विदेशी आक्रमणकारियों—नादिर शाह दुर्रानी और अहमद शाह अब्दाली—के हमलों ने मुगल सत्ता को और भी निर्बल कर दिया। इसके अलावा देश के भीतर से मराठों, रुहेलों और सिख मिसलों (सिख सैन्य समूहों) के निरंतर हमलों ने दिल्ली की ताकत को पूरी तरह से खोखला कर दिया था। बाजीराव की मराठा सेनाओं ने 1737 ई. में दिल्ली पर आक्रमण किया। वहीं, सिख मिसलों ने 9 जनवरी 1765 ई. से लेकर 23 अगस्त 1787 ई. तक दिल्ली पर कुल 17 बार धावा बोला।

सिख मिसलों ने पहली बार राजा सूरजमल के पुत्र जवाहर सिंह की सहायता करते हुए दिल्ली पर आक्रमण किया था। उस समय दिल्ली के निकट बुराड़ी घाट पर यमुना के किनारे सिखों (खालसा) का शिविर लगा हुआ था। जवाहर सिंह हाथी पर सवार होकर बुराड़ी घाट के पास पहुंचा और नंगे पैर खालसा शिविर में आकर अपने आने का कारण बताया। उसने कहा कि उसका भरतपुर राज्य ‘नानकपंथी’ है और जब से श्री गुरु हरगोबिंद साहिब जी ने उसके पूर्वजों को ग्वालियर के किले से आजाद करवाया था, तब से उनका राजघराना गुरु नानक के घर को ही अपना राजगुरु मानता है। डॉ. हरि राम गुप्ता के अनुसार, सौ सिख सरदारों की सभा में जवाहर सिंह द्वारा की गई अपील पर विचार किया गया और उसके बाद अरदास की गई।

उस समय 15 हजार सिखों ने दिल्ली पर आक्रमण के लिए जवाहर सिंह की सहायता की। हमले के दौरान दल खालसा ने पुरानी सब्जी मंडी के पास स्थित पहाड़ी तक कब्जा कर लिया। यह लड़ाई 25 जनवरी 1765 ई. तक चली। दिल्ली पर हुए इस पहले आक्रमण में सिख सेनाएं शहर के चारों ओर बनी दीवार को भेदने और दरवाजे तोड़ने में तो सफल नहीं हो सकीं, लेकिन उन्होंने दिल्ली के आस-पास मौजूद मुगल फौजदारों का भारी नुकसान किया। इस आक्रमण की खास बात यह रही कि सिखों ने अपने उच्च आदर्शों का पालन करते हुए किसी भी बेगम या बहू-बेटी को कोई नुकसान नहीं पहुंचाया।

दिल्ली की ओर कूच और ऐतिहासिक विजय

फरवरी 1783 ई. में जत्थेदार जस्सा सिंह आहलूवालिया और सरदार बघेल सिंह के नेतृत्व में सिख सेनाओं ने दिल्ली फतह करने के लिए कूच किया। रास्ते में जीत दर्ज करते हुए सिख सैनिक 8 मार्च 1783 ई. को यमुना नदी के बुराड़ी घाट पर पहुंचे, जो दिल्ली से उत्तर दिशा में 16 किलोमीटर दूर स्थित है। सिखों ने अपनी सेना को दो हिस्सों में बांट दिया। एक जत्थे का नेतृत्व जत्थेदार जस्सा सिंह आहलूवालिया कर रहे थे और दूसरे का नेतृत्व सरदार बघेल सिंह के हाथों में था।

सरदार बघेल सिंह की कमान में 30,000 सिख सैनिक थे। जहां इन सैनिकों ने अपना पड़ाव डाला और छावनी बनाई, उसे आज ‘तीस हजारी’ के नाम से जाना जाता है (वर्तमान में यहां दिल्ली का उच्च न्यायालय स्थित है)। सिखों ने सबसे पहले मलका गंज और सब्जी मंडी पर आक्रमण करके उन्हें अपने कब्जे में ले लिया। मुगल सेना के राजा मिर्जा शिकोह ने महताबपुर किले के पास सिखों को रोकने का प्रयास किया, लेकिन वह असफल रहा और हारकर लाल किले में जा छिपा। 9 मार्च को फजल अली खान ने भी सिख सेनाओं को रोकने की कोशिश की, लेकिन विफलता के बाद वह भी लाल किले के भीतर भाग गया। इसके बाद सिख सेनाओं ने अजमेरी गेट के रास्ते दाखिल होकर हौज काजी का इलाका जीत लिया। हालात बिगड़ते देख लाल किले के दरवाजे बंद कर दिए गए और चारों ओर सुरक्षा कड़ी कर दी गई।

11 मार्च 1783 ई. को जत्थेदार जस्सा सिंह आहलूवालिया, सरदार बघेल सिंह, सरदार जस्सा सिंह रामगढ़िया, सरदार तारा सिंह घेबा, सरदार महा सिंह शुकरचक्किया, सरदार खुशहाल सिंह, सरदार करम सिंह, सरदार भाग सिंह, सरदार साहिब सिंह, सरदार शेर सिंह बुड़िया, सरदार गुरदित्त सिंह लाडोवालिया, सरदार करम सिंह शाहाबाद और सरदार गुरबख्श सिंह अंबाला जैसे महान योद्धा ‘मजनूं का टीला’ नामक स्थान पर एकत्र हुए।

इन जत्थेदारों के नेतृत्व में सिख सेनाओं ने दिल्ली पर भीषण आक्रमण किया। इस हमले के दौरान सिख सेनाएं दिल्ली की एक तरफ की दीवार में सेंध लगाकर शहर में दाखिल हो गईं। दीवार को तोड़कर जहां एक बड़ा सुराख बनाया गया था, वह जगह आज ‘मोरी गेट’ के नाम से प्रसिद्ध है। सिख सैनिक लाहौरी गेट, मीना बाजार और नक्कारखाना को पार करते हुए सीधे ‘दीवान-ए-आम’ में पहुंच गए।

लाल किले पर अधिकार और समझौता

सिखों के भय से बादशाह के दरबारी जनाना महल (महिलाओं के कक्ष) में जाकर छिप गए। सिखों ने लाल किले पर पूरी तरह से कब्जा कर लिया और सरदार बघेल सिंह के नेतृत्व में कुछ सिखों ने लाल किले की प्राचीर पर खालसा का ‘केसरी निशान’ (ध्वज) फहरा दिया।

दिल्ली के किले पर अधिकार करने के बाद, सिख सेनाओं ने अपने उच्च नैतिक चरित्र का परिचय दिया। सरदार बघेल सिंह के कड़े निर्देश थे कि न तो किसी निर्दोष की हत्या की जाए और न ही शाही घरानों की बेगमों का अपमान हो। लाल किले के निवासियों ने इतिहास में पहली बार ऐसे आक्रमणकारी देखे थे, जिन्होंने किसी को भी अपमानित या प्रताड़ित नहीं किया था।

शाह आलम द्वितीय, जो लाल किले के चोर दरवाजे से अपनी जान बचाकर भाग निकला था, उसने बेगम समरू और मुंशी राम दयाल के साथ एक प्रतिनिधिमंडल को सरदार बघेल सिंह के पास समझौता करने के लिए भेजा। अंततः यह तय हुआ कि:

  • बादशाह सिखों की सरदारी (प्रभुत्व) स्वीकार करेगा।

  • सब्जी मंडी का क्षेत्र कुछ मील तक सरदार बघेल सिंह के अधीन रहेगा।

  • इस क्षेत्र का पूरा राजस्व और कर (टैक्स) सरदार बघेल सिंह को मिलेगा।

सिख जनरलों ने लंबे विचार-विमर्श के बाद शाह आलम के साथ समझौता करने का पूर्ण अधिकार सरदार बघेल सिंह को सौंप दिया। उस समय जो ऐतिहासिक समझौता हुआ, उसे सोने के 7 पत्रों (चादरों) पर उकेरा गया था।

जत्थेदार जस्सा सिंह आहलूवालिया ने स्थिति का आकलन करने के बाद दिल्ली से वापस पंजाब लौटने की घोषणा कर दी। अन्य जनरलों ने सरदार जस्सा सिंह रामगढ़िया को भी पंजाब लौटने की सलाह दी। प्रस्थान से पहले, सरदार जस्सा सिंह रामगढ़िया ने लाल किले के राजसिंहासन की ऐतिहासिक शिला, चवालीस खंभों और चार तोपों को अपने कब्जे में लिया और श्री अमृतसर की ओर कूच कर दिया। लाल किले से लाई गई सिंहासन की वह शिला और चवालीस खंभे आज भी श्री हरमंदिर साहिब, अमृतसर के रामगढ़िया बुंगा में सुरक्षित रखे हुए हैं।

Ramgarhia Bunga Amritsar Red Stone from Red Fort of Delhi used here

समझौते के अनुसार, सरदार बघेल सिंह दिल्ली में ही रुके। उन्होंने वहां ऐतिहासिक गुरुद्वारों का निर्माण करवाया और हस्तलिखित श्री गुरु ग्रंथ साहिब जी का प्रकाश करवाया।

सरदार बघेल सिंह का योगदान और वापसी

सरदार बघेल सिंह 4,000 सिखों के साथ नवंबर 1783 ई. तक दिल्ली में रहे और इस पूरे समय उनका मुख्य डेरा सब्जी मंडी में ही रहा। जब उनके वापस पंजाब लौटने का समय आया, तो शाह आलम ने उन्हें उपहार (नजराने) के रूप में रायसीना और रकाब गंज क्षेत्र की 1,200 एकड़ जमीन भेंट की। यह वही ऐतिहासिक जमीन है जहां आज इंडिया गेट, संसद भवन, केंद्रीय सचिवालय, राष्ट्रपति भवन और पालिका बाजार स्थित हैं। शाह आलम द्वारा फारसी में जारी किया गया वह मूल आदेश आज भी ‘राष्ट्रीय अभिलेखागार’ (National Archives), दिल्ली में सुरक्षित है।

जब सिखों ने 11 मार्च 1783 ई. को दिल्ली फतह की, तो दिल्ली के हुक्मरान सिखों के सामने मिन्नतें करते नजर आए। उस दौर में पंजाब में एक लोकगीत बहुत प्रचलित हुआ:

“सुत्ती पई दी भैणो नी मेरी बेसर हिली, भैणो दिओ वधाइयां नी सिंघां दिल्ली मली।” (हे बहनों, मैं सो रही थी और मेरी नाक की नथ हिल गई, बहनों मुझे बधाई दो क्योंकि सिखों ने दिल्ली पर कब्जा कर लिया है।)

उस समय सिख योद्धा आम तौर पर बड़े गर्व से कहा करते थे कि “दिल्ली क्या है, जैसे बिल्ली मार ली, वैसे ही दिल्ली मार ली।” (अर्थात, उनके लिए दिल्ली को फतह करना एक बहुत ही सामान्य और आसान काम था)।

आज के दिन लाल किले पर केसरी निशान फहराने वाले उन महान सिख सरदारों को समूचा खालसा पंथ अत्यंत गर्व और सम्मान के साथ याद करता है।