इंटरनेशनल सिख कंफ़ेडरेशन ने “अकाल तख्त: सिद्धांत और संस्थान” विषय पर चर्चा करवाई

इंटरनेशनल सिख कंफ़ेडरेशन ने चंडीगढ़ में ‘अकाल तख्त: सिद्धांत और संस्थान’ विषय पर एक अहम चर्चा आयोजित की, जिसमें विभिन्न विद्वानों ने इसके व्यावहारिक, संरचनात्मक और सैद्धांतिक पहलुओं पर अपने विचार साझा किए।

International Sikh Confederation hosts discussion on Akal Takht Sahib

चंडीगढ़: इंटरनेशनल सिख कंफ़ेडरेशन द्वारा 27 जून 2026, दिन शनिवार को चंडीगढ़ के सेक्टर 36 स्थित पीपल्स कन्वेंशन सेंटर में “अकाल तख्त: सिद्धांत और संस्थान” विषय पर एक विचार चर्चा का आयोजन किया गया।

विचार चर्चा की शुरुआत करते हुए डॉ. बरिंद्रा कौर ने कहा कि इंटरनेशनल सिख कंफ़ेडरेशन द्वारा अकाल तख्त साहिब के सिद्धांत और संस्था से जुड़े विषय को अकादमिक चर्चा के केंद्र में लाने का प्रयास किया जा रहा है। उन्होंने कहा कि विद्वानों की भूमिका सिद्धांत और संस्था के बीच पुल वाली होती है। जब किसी संस्था के कार्य-व्यवहार में सिद्धांत के पक्ष से कमियां आ जाएं तो विद्वानों को उन कमियों को चिन्हित करके उन्हें दूर करने के लिए सुझाव देना होता है।

इस अवसर पर डॉ. अमरजीत सिंह ग्रेवाल ने अपना मुख्य भाषण प्रस्तुत किया। उन्होंने कहा कि अकाल तख्त साहिब इमारत नहीं बल्कि सिद्धांत है। अकाल तख्त साहिब कोई पद नहीं, अकाल तख्त गुरु पंथ की गुरमति आधारित ज़मीर (अंतरात्मा) है। अकाल तख्त हुकूमत नहीं, अकाल तख्त सरबत के भले की जवाबदेह सेवा है।

अपने पर्चे (शोध पत्र) में उन्होंने अकाल तख्त के मूल सिद्धांत, अकाल तख्त की अथॉरिटी कहाँ से आती है, आज का विरोधाभास और स्वायत्तता के अर्थ, पार-राष्ट्रीय युग में अकाल तख्त, सिख दुनिया को क्या दे सकते हैं, मिशन को आगे कैसे बढ़ाया जाए, मिशन की भाषा और अंतिम अपील जैसे शीर्षकों के तहत अपने विचार साझा किए।

अकाल तख्त साहिब के प्रबंध के संबंध में किए जाने वाले पांच कार्यों के बारे में उन्होंने कहा कि अकाल तख्त का अपना संविधान होना चाहिए, सरबत पंथक संसद अस्तित्व में होनी चाहिए, जत्थेदार का चुनाव स्वतंत्र होना चाहिए, अकाल तख्त का ग्लोबल सचिव होना चाहिए, ग्लोबल संगत फंड बनना चाहिए, और निर्णय प्रक्रिया न्यायसंगत होनी चाहिए।

International Sikh Confederation hosts discussion on Akal Takht Sahib in Chandigarh on 27 June 2026
इंटरनेशनल सिख कंफ़ेडरेशन द्वारा आयोजित की गई विचार गोष्ठी की एक तस्वीर

डॉ. केहर सिंह ने कहा कि डॉ. अमरजीत सिंह ग्रेवाल के पर्चे में दर्शाए गए सैद्धांतिक मार्गदर्शन की प्रशंसा करनी बनती है। उन्होंने कहा कि सैद्धांतिक चर्चा अपनी जगह अहम और जरूरी है, लेकिन बड़ी बात व्यावहारिकता की है, जिसके बारे में बात बहुत कम हो रही है। उनके अनुसार, अकाल तख्त साहिब से संबंधित सैद्धांतिक पक्ष तो स्पष्ट है, लेकिन व्यावहारिक दृष्टिकोण से क्या किया जा सकता है, इस पर चर्चा होनी चाहिए; केवल विचारों तक सीमित रहना ठीक नहीं है। उन्होंने जोर दिया कि मौजूदा स्थापना सहित किसी को भी बाहर नहीं छोड़ा जाना चाहिए और यह विचार किया जाना चाहिए कि सभी के साथ संवाद कैसे रचाया जा सकता है।

इंस्टीट्यूट ऑफ सिख स्टडीज़ के उपाध्यक्ष गुरप्रीत सिंह ने कहा कि हमें ऐसी विचार चर्चाओं की बहुत जरूरत है।

सिख सियासत के संपादक परमजीत सिंह गाज़ी ने इस विचार चर्चा के अवसर पर पिछले साल पंथ सेवक जत्था दोआबा द्वारा “तख्त साहिबान के प्रबंध के बारे में सुझाव (कार्य क्षेत्र, संरचना, पात्रता)” शीर्षक के तहत जारी किए गए दस्तावेज़ से बुनियादी बिंदु साझा किए। अकाल तख्त साहिब के कार्य क्षेत्र का वर्णन करते हुए उन्होंने कहा कि अकाल तख्त साहिब गुरमति के शुद्ध स्वरूप का रक्षक, साझे नीतिगत फैसले लेने का सिरमौर मंच, खालसा राजनीतिक जमातों का केंद्रीय धुरा, समूची गुर-संगति का प्रतिनिधि और धर्म युद्ध के लिए सर्वोच्च नेतृत्वकर्ता है। उन्होंने कहा कि खालसा पंथ में साझे नेतृत्व का विधान है, इसलिए एक व्यक्ति को जत्थेदार लगाने या हटाने के विधि-विधान की जगह हमें एक व्यापक ढांचागत बदलाव लाने की जरूरत है।

डॉ. अमरजीत सिंह ग्रेवाल के पर्चे पर टिप्पणी करते हुए उन्होंने कहा कि इस पर्चे में भी सिर्फ एक व्यक्ति जत्थेदार के बारे में विधि-विधान बनाने की बात की गई है। उन्होंने सुझाव दिया कि इस समय कम से कम पांच व्यापक ढांचे बनाने की जरूरत है जिनमें गुरसंगति प्रतिनिधि सभा, सरबत खालसा, पंच प्रधानी पंचायत, अकाल तख्त सेवा संभाल जत्था और इस जत्थे के मुखिया के रूप में तख्त साहिब के जत्थेदार के बारे में नियम-विधान शामिल हैं।

पंथिक तालमेल संगठन के मुखिया ज्ञानी केवल सिंह ने कहा कि अकाल तख्त साहिब के जत्थेदार की नियुक्ति और सेवानिवृत्ति से संबंधित विधि-विधान बनाने के प्रयास पहले भी हुए हैं, लेकिन इसके बावजूद प्रबंध के हालात लगातार बिगड़ते ही गए हैं। अतः इसे दुरुस्त करने के लिए कोई व्यावहारिक पहल होनी चाहिए। उन्होंने सुझाव दिया कि मौजूदा समय में एक “शैडो प्रबंध” बनाने का प्रयास किया जाना चाहिए।

सीनियर पूर्व पत्रकार जसपाल सिंह सिद्धू ने कहा कि मौजूदा समय में प्रचलित नेशन स्टेट की संरचना जटिल है और हम अपने ढांचों को उस स्तर के मेल तक नहीं ले जा सके। उन्होंने कहा कि सिखों में अठारहवीं सदी को बहुत आदर्श रूप में देखा जा रहा है, जबकि उस समय के दौरान रही कमियों और आई गिरावटों की ओर ध्यान नहीं दिया जा रहा है। गुरुद्वारा प्रबंध पंथक हाथों में लेने के लिए चले संघर्ष के बाद अस्तित्व में आई पहली शिरोमणि कमेटी ने सैद्धांतिक तौर पर बहुत स्पष्टता लाई थी, लेकिन 1925 के एक्ट और खासकर 1947 के बाद शिरोमणि कमेटी पर वोट राजनीति हावी हो गई है। सिखों में सरकारी दखलंदाजी की शुरुआत 1925 के गुरुद्वारा एक्ट से हुई है। इस समय सुधारवादी नहीं बल्कि क्रांतिकारी पहलों की जरूरत है।

पूर्व सीनियर पत्रकार करमजीत सिंह ने अकाल तख्त साहिब और जत्थेदारों की नियुक्ति व सेवानिवृत्ति के बारे में विधि-विधान बनाने के पिछले प्रयासों का जिक्र किया और कहा कि किसी भी नए प्रयास से पहले पिछले दस्तावेज़ों का अध्ययन जरूर किया जाना चाहिए। डॉ. अमरजीत सिंह ग्रेवाल के पर्चे पर टिप्पणी करते हुए उन्होंने कहा कि यह कहना कि अकाल तख्त इमारत नहीं सिद्धांत है, असल में शरीर को आत्मा से अलग करके दर्शाने वाली बात है। उन्होंने स्पष्ट किया कि अकाल तख्त साहिब की हैसियत सिरमौर यानी “सॉवरेन” है, केवल स्वायत्त या ऑटोनोमस नहीं।

जसवंत सिंह जफ़र ने कहा कि सिखों में यह बड़ी दुविधा है कि वे अपने सिद्धांत की बात करके अपने आप को श्रेष्ठ बताते हैं, लेकिन दूसरों के व्यवहार की बात करके उन्हें नीचा दिखाते हैं।

इंस्टीट्यूट ऑफ सिख स्टडीज़ के अध्यक्ष गुरबीर सिंह ने कहा कि इस चर्चा के दौरान ज्यादातर बात अकाल तख्त साहिब के बारे में हो रही है जबकि हमें सभी तख्त साहिबान के बारे में बात करनी चाहिए। मौजूदा प्रबंध के बारे में बात करते हुए उन्होंने कहा कि ये प्रबंध कानून के दायरे में काम कर रहे हैं और इस तरह तख्तों को सरकारी कानून के अधीन किया जा रहा है, जबकि कानून में सिख तख्तों को तख्त नहीं बल्कि गुरुद्वारे माना गया है। सिखों को अपना सिख विधिशास्त्र (ज्यूरिस्प्रूडेंस) पैदा करने की जरूरत है। उन्होंने कहा कि हमें “इंस्टीट्यूशन ऑफ सिख तख्त” बनाने की जरूरत है जो कि आंतरिक और बाहरी टकरावों का समाधान करेगा और गुरमति की शिक्षा के केंद्र के रूप में कार्य करेगा।

वक्ताओं द्वारा विचार साझा किए जाने के बाद मुख्य वक्ता डॉ. अमरजीत सिंह ग्रेवाल ने पर्चे पर टिप्पणियां करने वाले विचारकों का धन्यवाद किया और कहा कि वे प्राप्त सुझावों के अनुसार अपने पर्चे में संशोधन करेंगे।

अंत में, डॉ. बलकार सिंह ने समागम के अध्यक्ष के तौर पर अपने विचार रखे और इस चर्चा में हिस्सा लेने वाले सभी विचारकों का स. के.पी. सिंह ने इंटरनेशनल सिख कंफ़ेडरेशन की ओर से धन्यवाद किया।