आज़ादी समर्थक सिख संगठनों ने जारी किया साझा नीति दस्तावेज़

श्री अमृतसर साहिब में सिख संगठनों ने एक साझा नीति दस्तावेज़ जारी किया है। इस मौके पर विभिन्न जत्थेबंदियों के नेताओं ने वर्तमान हालात, भविष्य की रणनीति और पंथक लक्ष्यों पर अपने विचार रखे।

Document Release at Akal Takht Sahib (29 April 2026)

श्री अमृतसर साहिब: 29 अप्रैल 1986 के खालिस्तान ऐलाननामे की 40वीं वर्षगांठ के अवसर पर बीते दिन खालसा पंथ और गुरु संगत की ओर से चार सिख संगठनों द्वारा श्री अमृतसर साहिब में संयुक्त रूप से एक कार्यक्रम आयोजित किया गया। इस मौके पर दल खालसा, पंच प्रधानी जत्था, अकाल फेडरेशन, शिरोमणि अकाली दल अमृतसर और भाई जगतार सिंह हवारा कमेटी द्वारा “खालिस्तान: सिद्धांत, विरासत और भविष्य” शीर्षक के तहत एक साझा नीति दस्तावेज़ जारी किया गया।

26 जनवरी 1986 के सरबत खालसा की 40वीं वर्षगांठ संयुक्त रूप से मनाने के बाद इन संगठनों की यह दूसरी सार्वजनिक साझा एकत्रता थी। इस मौके पर बुर्ज अकाली बाबा फूला सिंह जी, श्री अमृतसर साहिब में सिख संगठनों के प्रमुख नेता और अन्य संघर्ष समर्थक हस्तियां एकत्रित हुईं, जहां गुरबाणी का रसभिना बीर रसी कीर्तन गायन किया गया। दीवान की समाप्ति के बाद समूह संगत द्वारा काफिले के रूप में अकाल तख्त साहिब की ओर प्रस्थान किया गया।

अकाल तख्त साहिब के सम्मुख भाई सतनाम सिंह झंजियां द्वारा अरदास की गई, जिसके दौरान जंगे-आज़ादी (स्वतंत्रता संग्राम) में हिस्सा लेने वाले शहीदों को याद करते हुए भविष्य के लिए नीति दस्तावेज़ जारी करने की अनुमति मांगी गई।

पंच प्रधानी जत्थे की ओर से भाई दलजीत सिंह, दल खालसा की ओर से भाई परमजीत सिंह मंड, अकाल फेडरेशन की ओर से भाई नारायण सिंह चौड़ा, जत्थेदार जगतार सिंह हवारा कमेटी की ओर से भाई महावीर सिंह और शिरोमणि अकाली दल अमृतसर की ओर से सरदार सिमरनजीत सिंह मान के हस्ताक्षरों वाला यह नीति दस्तावेज़ श्री अकाल तख्त साहिब में भाई परमजीत सिंह गाज़ी, भाई हरपाल सिंह बलेर, एडवोकेट भाई जसपाल सिंह मंझपुर, भाई परमजीत सिंह मंड और भाई महावीर सिंह द्वारा संयुक्त रूप से जारी किया गया।

इसके बाद श्री अकाल तख्त साहिब सचिवालय के सामने आयोजित पत्रकार वार्ता के दौरान दस्तावेज़ जारी करने वाली हस्तियों ने इस नीति दस्तावेज़ के चुनिंदा हिस्से पढ़कर सुनाए।

इस दस्तावेज़ में कहा गया है कि:

“29 अप्रैल 2026 को खालिस्तान ऐलाननामे की 40वीं वर्षगांठ के मौके पर हम हजारों जांबाज सिंहों, बीबियों और भुझंगियों की शहादत, कुर्बानी और जंगी कारनामों को सिजदा करते हुए, स्वतंत्रता प्राप्ति के लिए तय राजनीतिक लक्ष्य खालिस्तान के लिए लड़े जा रहे ‘पंथक धर्म युद्ध’ में अपना योगदान देने का दृढ़ निश्चय प्रकट करते हैं।”

“गुरु खालसा पंथ के सेवादार और इस जंगे-आज़ादी के सिपाही होने के नाते सतगुरु नानक साहिब सच्चे पातशाह जी के हुज़ूर अरदास करते हैं कि हमें पंथक धर्म युद्ध के मार्ग पर चलने के लिए सूझ-समझ, सामर्थ्य, दृढ़ता और एकता-इत्तेफाक बख्शें।”

मौजूदा हालात के बारे में इस दस्तावेज़ में कहा गया है कि:

“पूरी दुनिया में बिखराव का दौर है। व्यापारिक युद्ध, राजनीतिक-सैन्य युद्ध, तकनीक का युद्ध, नैरेटिव (विमर्श) का युद्ध आदि युद्धों के कारण विश्व की राजनीतिक और आर्थिक प्रणालियां बड़े बदलावों से गुजर रही हैं।”

“इंडिया को ‘संवैधानिक हिंदुत्वी साम्राज्य’ बनाने के लिए राजतंत्र में संस्थागत और कानूनी बदलाव किए जा रहे हैं और अलग पहचानों को मिटाने के लिए दमन चक्र प्रचंड किया जा रहा है।”

“विप्र इंडियन साम्राज्य द्वारा सिखों के संस्थानों को बे-साख करने और नेतृत्व को बिखेरने की नीति के अनुसार व्यापक रणनीतिक मुहीम चलाई जा रही हैं। सिख इस समय गंभीर सूक्ष्म और स्थूल हमलों का सामना कर रहे हैं।”

“ऐसे निर्णायक मोड़ पर यह लाजमी है कि सिख राजनीति के बारे में हो रही विचार-चर्चाएं महज वोट राजनीति और ‘सूबेदारी’ हासिल करने के लिए सियासी जोड़-तोड़ तक ही सीमित न रह जाएं, बल्कि हम जंगे-आज़ादी के लिए अपने नेतृत्व के ढांचों के बारे में आत्म-चिंतन करें, राज्य प्राप्ति की ओर बढ़ने के लिए साझा रणनीति बनाएं और यह विचारें कि भविष्य में अपनी किस्मत कैसे गढ़नी है।”

“इसलिए आज हमारे द्वारा लिए गए फैसलों की गूंज आने वाले लंबे भविष्य तक सुनाई देगी—बिल्कुल वैसे ही, जैसे 1947 से पहले लिए गए फैसलों के नतीजे सामने आए थे।”

इस दस्तावेज़ में सबसे पहले जंगे-आज़ादी में शहादत प्राप्त करने वालों और योगदान देने वालों को याद किया गया है। उसके बाद 29 अप्रैल 1986 के ऐलाननामे के बुनियादी इकरार और मान्यताएं साझा की गई हैं।

इसके उपरांत दस्तावेज़ में ‘जंगे-आज़ादी के अहम असर’ बयान किए गए हैं और उसके बाद ‘पंथक निशाने (लक्ष्य)’ के बारे में साझी समझ दर्ज की गई है। इसके बाद ‘धर्म युद्ध का सिद्धांत और रणनीति’ तथा ‘धर्म युद्ध का नेतृत्व’ के बारे में स्पष्टता दी गई है।

इससे आगे ‘विप्र इंडियन साम्राज्य बनाम गुरु खालसा पंथ’ शीर्षक के तहत ‘1947 में ब्रिटिश इंडिया का विप्र इंडिया का रूप धारण करना’ और ‘विप्र इंडियन साम्राज्य का स्वरूप’ दर्ज किया गया है। दस्तावेज़ के अगले भाग, जिसका शीर्षक ‘गुरु खालसा पंथ की विप्र इंडिया साम्राज्य के साथ जंग के बुनियादी कारण’ है, उसमें ‘संग्राम का सैद्धांतिक और संस्थागत आधार’ दर्ज किया गया है।

इसके बाद ‘पिछले 40 सालों में विप्र इंडियन स्टेट के हमले की प्रकृति और प्रभाव’ दर्शाए गए हैं और उसके बाद ‘सिखों को गुलामी के हालात में रखने और नेतृत्वविहीन करने की विप्र इंडिया साम्राज्य की रणनीति के पैंतरे’ दर्ज किए गए हैं। इसके बाद ‘इंडियन साम्राज्य के हमले के प्रति खालसा जी की साझी घालना’ का जिक्र किया गया है।

इससे आगे दस्तावेज़ में ‘वर्तमान स्थिति, संभावनाएं और चुनौतियां’ शीर्षक के तहत ‘नए विश्वव्यापी प्रबंध के प्रसंग में इंडिया, दक्षिण एशिया और विश्व राजनीति के मौजूदा हालात’ दर्ज करते हुए ‘पंजाब और पंथ के लिए संभावनाएं और चुनौतियां’ दर्ज की गई हैं।

दस्तावेज़ में आगे ‘पंजाब के महत्व’ का जिक्र करते हुए पंजाब का ‘भौगोलिक व राजनीतिक महत्व’, पंजाब का ‘गुरमति आधारित सभ्यता के विकास की ऐतिहासिक धरती’ होने के रूप में महत्व और पंजाब का ‘प्राकृतिक संसाधनों की उपजाऊ धरती’ होने के रूप में महत्व दर्ज किया गया है।

इसके बाद इस दस्तावेज़ में ‘खालिस्तान सिद्धांत, स्वरूप और गुण’ शीर्षक के तहत सबसे पहले ‘राजतंत्र की गुरमति आधारित प्रणाली और आदर्शों के बाबत पंजाब के साझे भाईचारे के साथ इकरार’ दर्ज किए गए हैं। इसके बाद ‘खालिस्तान– गुरुद्वारा परंपरा और निष्काम सेवा का व्यापक रूप’ और ‘खालिस्तान के कुछ गुण’ शीर्षकों के तहत साझी समझ दर्ज की गई है।

दस्तावेज़ का आखिरी भाग ‘भविष्य के कदमों के लिए नीतिगत दिशा-निर्देश’ है, जिसके तहत कुल 14 नुक्ते दर्ज किए गए हैं।

पहले नुक्ते में कहा गया है कि:

“हम 1947 में फिरंगी (अंग्रेज़ों) द्वारा दक्षिण एशिया के इस क्षेत्र के हिंदू और मुस्लिम दो राष्ट्रों के सिद्धांत के आधार पर किए गए विभाजन को गलत मानते हैं। हम श्री अमृतसर घोषणापत्र में दर्ज भावना के अनुसार दक्षिण एशिया के इस क्षेत्र को अलग-अलग मत-मजहब, विश्वासों-मान्यताओं, सांस्कृतिक कौमों, नस्लों और ऐतिहासिक राज्यों-रियासतों वाला विविधतापूर्ण क्षेत्र मानते हैं। इसलिए इस क्षेत्र का पुनर्निर्माण किया जाना जरूरी समझते हैं ताकि यहां की अलग-अलग पहचान वाले समूह स्वतंत्रता का आनंद ले सकें।”

दूसरा नुक्ता:

“खालिस्तान की मान्यता प्राप्त करने के लिए विभिन्न देशों की सरकारों और अंतरराष्ट्रीय संस्थानों के साथ किए जा रहे कूटनीतिक प्रयासों को संस्थागत रूप दिया जाए।”

तीसरे नुक्ते में:

“विश्व समुदाय के सम्मुख स्वतंत्र खालिस्तान के आदर्शों, सिद्धांतों और नैतिक उसूलों को बुलंद आवाज में पेश करने के लिए संग्राम कर रहे अन्य जन-समूहों, संग्राम समर्थक सरकारों और अंतरराष्ट्रीय संस्थानों के साथ संबंध मजबूत करने के लिए और सहयोग के लिए स्थायी प्रणालियां विकसित करने” की नीतिगत दिशा दी गई है।

दस्तावेज़ में दर्ज नीतिगत दिशा-निर्देशों के बाकी नुक्ते इस प्रकार हैं:

“विप्र इंडियन साम्राज्य की ओर से हो रहे जुल्म में शामिल अपराधियों को जवाबदेह बनाने के लिए पंजाब में मानवाधिकार उल्लंघनों और प्राकृतिक संसाधनों की लूट संबंधी दस्तावेजीकरण करके सबूत इकट्ठे करने, संभालने और विश्व स्तर तक पैरवी करने हेतु संस्थागत प्रणाली विकसित की जाए।”

“आज़ाद खालिस्तान के विधान और शासन के लिए बुनियादी प्रणालियों की रूपरेखा का विस्तृत दस्तावेज़ तैयार किया जाए।”

“साझी पंथक ताकत के विकास के लिए स्पष्ट रणनीतिक दिशाएं तैयार करके दस्तावेज़ जारी किया जाए।”

“दुनिया भर की गुरु-संगत और पंजाब के विभिन्न समुदायों के साथ साझी चुनौतियों और संभावनाओं के विचार हेतु नियमित संवाद के लिए प्रणाली विकसित की जाए।”

“जंगे-आज़ादी के बीते और मौजूदा अमल की अंदरूनी पड़ताल के लिए प्रणाली विकसित की जाए।”

“मौजूदा अस्थिर दौर में संगत के नेतृत्व और साझे फैसलों पर निष्ठा कायम रखने के लिए ‘पंच-प्रधानी’ और ‘गुरमता’ युक्ति के अनुसार खालिस्तान के नेतृत्व का एक साझा और संगती मंच स्थापित किया जाए, जिसमें हर जत्थे की स्वायत्त हस्ती कायम रहे।”

“गुरु खालसा पंथ को सही रूप में संगठित करने के लिए गुरुसंगत के अंदरूनी जत्थों की बनावट को पारंपरिक खालसाई युक्ति के अनुसार पुनर्जीवित करने के लिए प्रयास किए जाएं।”

“जंगे-आज़ादी, पंथक संस्थानों और जत्थों के लिए सही नेतृत्व को उभारने और आम गुरुसंगत में पंथक चरित्र गढ़ने के लिए सिख जत्थेबंदियों और संस्थानों में व्यक्तिगत और पंथक रहत आधारित जीवन युक्ति को प्रोत्साहित किया जाए।”

“विप्र इंडियन साम्राज्य के संवैधानिक दायरे से बाहर खालसा जी की स्वतंत्र पातशाही को विकसित करने और ‘खालसा जी के बोल बाले’ के शाश्वत पंथक लक्ष्य हेतु जमीनी स्तर पर ‘मीरी-पीरी’ के सिद्धांत के अनुसार युवाओं और गुरु-संगत के सक्रिय स्थानीय स्वायत्त जत्थों को उभारा और संगठित किया जाए।”

“मन और मति पर हावी लौकिक पदार्थवादी और राज्यवादी दर्शन को तोड़ने के लिए गुरमति ज्ञान प्रणालियों और विद्यालयों का नवीनीकरण करते हुए पंथक चेतना और विचारधारात्मक स्पष्टता को मजबूत करने वाली शिक्षा प्रणाली विकसित की जाए।”

“गुरमति आधारित विश्वदृष्टि के विकास और प्रचार के लिए विश्व स्तर पर संस्थागत प्रयास किए जाएं।”


⊕ इस नीति दस्तावेज़ का पी.डी.एफ (PDF) प्राप्त करें → पंजाबी | अंग्रेजी