81वीं संयुक्त राष्ट्र महासभा के दौरान सिखों के आत्मनिर्णय का मुद्दा उठाया

81वीं संयुक्त राष्ट्र महासभा के दौरान न्यूयॉर्क में आयोजित एक अंतरराष्ट्रीय सम्मेलन में सिख प्रतिनिधियों ने आत्मनिर्णय, राइट ऑफ रिटर्न और खालिस्तान की मांग से जुड़े मुद्दे उठाए।

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न्यूयॉर्क, संयुक्त राज्य अमेरिका: सिख फेडरेशन इंटरनेशनल (SFI) के एक प्रतिनिधिमंडल ने संयुक्त राष्ट्र महासभा के 81वें सत्र के दौरान न्यूयॉर्क स्थित संयुक्त राष्ट्र मुख्यालय में आत्मनिर्णय के मुद्दे पर आयोजित एक अंतरराष्ट्रीय सम्मेलन में भाग लिया।

“राइट ऑफ रिटर्न एंड डीकोलोनाइजेशन” शीर्षक से आयोजित इस सम्मेलन में प्रतिभागियों को संयुक्त राष्ट्र के राजनयिकों, अंतरराष्ट्रीय विशेषज्ञों और मानवाधिकार कार्यकर्ताओं के साथ उपनिवेशवाद से मुक्ति, न्याय और राजनीतिक अधिकारों से जुड़े मुद्दों पर विचार-विमर्श का अवसर मिला।

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81वीं संयुक्त राष्ट्र महासभा के दौरान आयोजित “राइट ऑफ रिटर्न एंड डीकोलोनाइजेशन” सम्मेलन में सिख प्रतिनिधि।

सिख फेडरेशन इंटरनेशनल के अनुसार, संयुक्त राष्ट्र महासभा के सत्र के दौरान संयुक्त राष्ट्र मुख्यालय में सिख प्रतिनिधियों की मौजूदगी से दुनिया के विभिन्न हिस्सों से आए प्रतिनिधियों के साथ विचारों के आदान-प्रदान का भी अवसर मिला।

सम्मेलन को संबोधित करने वाले सिख प्रतिनिधियों ने सिखों के आत्मनिर्णय के अधिकार, वापस लौटने के अधिकार और स्वतंत्र खालिस्तान की मांग पर बात की।

उन्होंने 29 अप्रैल 1986 को खालिस्तान की घोषणा का उल्लेख किया और कहा कि पिछले कई दशकों के दौरान सिखों द्वारा दी गई कुर्बानियां संप्रभुता से जुड़ी सिख राजनीतिक आकांक्षाओं की अभिव्यक्ति हैं।

दविंदरजीत सिंह ने ऐतिहासिक और राजनीतिक संदर्भ रखा

सिख फेडरेशन (यूके) में पॉलिटिकल एंगेजमेंट के चीफ एग्जीक्यूटिव दविंदरजीत सिंह ने कहा कि सिखों के आत्मनिर्णय के संघर्ष को 1849 में औपनिवेशिक कब्जे, 1947 के विभाजन और 1984 की

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81वीं संयुक्त राष्ट्र महासभा के दौरान आयोजित “राइट ऑफ रिटर्न एंड डीकोलोनाइजेशन” सम्मेलन में बोलते हुए दविंदरजीत सिंह।

घटनाओं के संदर्भ में देखा जाना चाहिए।

 

उन्होंने 1849 में संप्रभु सिख सत्ता पर ब्रिटिश कब्जे को औपनिवेशिक विजय बताया और तर्क दिया कि बाद में संयुक्त राष्ट्र चार्टर 1945 के तहत इस प्रकार का कब्जा गैरकानूनी माना गया।

सिंह ने सम्मेलन में कहा कि उनके विचार में 1947 के बाद का भारत आज़ादी के बजाय “ब्रिटिश सत्ता से एक केंद्रीकृत हिंदू-बहुल राज्य को सत्ता के हस्तांतरण” के रूप में सामने आया। उन्होंने यह भी कहा कि सिखों को स्वायत्तता के संबंध में किए गए वादे बाद में पूरे नहीं किए गए।

उन्होंने नागरिक एवं राजनीतिक अधिकारों पर अंतरराष्ट्रीय वाचा (ICCPR) के संबंध में भारत की आपत्ति का भी उल्लेख किया और कहा कि इससे भारत के लोगों के आत्मनिर्णय के अधिकार को प्रभावी रूप से नकारा गया। सिंह के अनुसार संयुक्त राष्ट्र मानवाधिकार समिति ने भारत की इस व्याख्या को कई बार अस्वीकार किया है, जिसमें जुलाई 2024 की समीक्षा भी शामिल है।

जसजीत सिंह ने वापस लौटने के अधिकार पर बात की

सिख फेडरेशन अमेरिका के जसजीत सिंह ने उपनिवेशवाद से मुक्ति, आत्मनिर्णय और वापस लौटने के अधिकार के बीच संबंध पर अपने विचार रखे।

उन्होंने कहा कि उपनिवेशवाद से मुक्ति का अर्थ केवल राजनीतिक प्रभुत्व के एक रूप को दूसरे रूप से बदलना नहीं होना चाहिए, बल्कि लोगों को बिना किसी दबाव या प्रभुत्व के अपना राजनीतिक, आर्थिक, सामाजिक और सांस्कृतिक भविष्य निर्धारित करने का अधिकार मिलना चाहिए।

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81वीं संयुक्त राष्ट्र महासभा के दौरान आयोजित “राइट ऑफ रिटर्न एंड डीकोलोनाइजेशन” सम्मेलन में जसजीत सिंह और अन्य प्रतिभागी।

उन्होंने वापस लौटने के अधिकार को उन सिख परिवारों की पीढ़ियों के अनुभवों से भी जोड़ा, जो पलायन, परिवारों से बिछड़ने, राजनीतिक हिंसा, कैद और निर्वासन से प्रभावित रहे हैं, लेकिन इसके बावजूद पंजाब के साथ अपने आध्यात्मिक, सांस्कृतिक और पारिवारिक संबंध बनाए हुए हैं।

प्रभजोत सिंह ने अंतरराष्ट्रीय कानून और सिख प्रवासी समुदाय पर रखे विचार

सिख फेडरेशन कनाडा के कानूनी सलाहकार प्रभजोत सिंह ने आत्मनिर्णय से जुड़े अंतरराष्ट्रीय कानून पर बात की और उन कदमों का उल्लेख किया जिन्हें उन्होंने निर्वासन में रह रहे सिख नेतृत्व को प्रताड़ित और दबाने के लिए भारतीय राज्य द्वारा अपनाए गए उपाय बताया।

उन्होंने कहा कि ऐसे कदमों का उद्देश्य सिख नेताओं को सिख धार्मिक स्थलों और परिवार के सदस्यों के साथ संबंध बनाए रखने तथा अपनी मातृभूमि के सार्वजनिक जीवन और भविष्य में भागीदारी से रोकना है।

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81वीं संयुक्त राष्ट्र महासभा के दौरान आयोजित “राइट ऑफ रिटर्न एंड डीकोलोनाइजेशन” सम्मेलन में प्रभजोत सिंह और अन्य प्रतिभागी।

प्रभजोत सिंह ने तर्क दिया कि अन्य नागरिक और राजनीतिक अधिकारों के सार्थक उपयोग के लिए आत्मनिर्णय का अधिकार बुनियादी महत्व रखता है।

उन्होंने यह भी कहा कि दक्षिण एशिया में स्थायी शांति के लिए आत्मनिर्णय ही एकमात्र रास्ता है और क्षेत्र के अलग-अलग लोगों की गरिमा और निर्णय लेने की स्वतंत्रता को मान्यता दी जानी चाहिए, बजाय इसके कि उन्हें औपनिवेशिक शक्तियों द्वारा बनाए गए राजनीतिक ढांचों के भीतर रहने के लिए मजबूर किया जाए।

उन्होंने कहा कि सिखों का आत्मनिर्णय का प्रयास सभी लोगों की गरिमा, न्याय और समृद्धि की सोच पर आधारित है, जिसे उन्होंने सिख सिद्धांत “सरबत दा भला” से जोड़ा।

इस सम्मेलन का आयोजन बाकू इनिशिएटिव ग्रुप द्वारा किया गया था। इसमें उपनिवेशवाद से मुक्ति, आत्मनिर्णय और मानवाधिकारों से जुड़े मुद्दों पर काम करने वाले विशेषज्ञों और कार्यकर्ताओं ने भाग लिया।

सिख फेडरेशन इंटरनेशनल के प्रतिनिधियों ने इस सम्मेलन के माध्यम से स्वतंत्र खालिस्तान के लिए अपने अभियान की ओर अंतरराष्ट्रीय ध्यान आकर्षित करने और विदेशों में रह रहे सिख असहमति रखने वालों के सामने आने वाली उन चुनौतियों को उजागर करने का प्रयास किया, जिनका उल्लेख संगठन ने अपने संबोधन में किया।


 

संयुक्त राष्ट्र महासभा के 81वें सत्र के दौरान सिख आत्मनिर्णय के संबंध में सिख फेडरेशन इंटरनेशनल द्वारा जारी पूरा बयान पढ़ें।