वाशिंगटन, डी.सी. — संयुक्त राज्य अंतर्राष्ट्रीय धार्मिक स्वतंत्रता आयोग ने अपनी 2026 की वार्षिक रिपोर्ट जारी की है, जिसमें 2025 कैलेंडर वर्ष के दौरान भारत के धार्मिक स्वतंत्रता रिकॉर्ड की अत्यधिक आलोचनात्मक समीक्षा की गई है। अधिकारों में लगातार हो रही गिरावट का हवाला देते हुए, इस द्विदलीय संघीय आयोग ने अमेरिकी विदेश विभाग से सिफारिश की है कि वह भारत को “व्यवस्थित, निरंतर और गंभीर धार्मिक स्वतंत्रता उल्लंघनों में शामिल होने और उन्हें सहन करने” के लिए “विशेष चिंता वाले देश” के रूप में नामित करे।
रिपोर्ट में नए कानूनों, राज्य-प्रायोजित हिरासत, धार्मिक अल्पसंख्यक समुदायों को निशाना बनाने और पूजा स्थलों के प्रबंधन के संबंध में महत्वपूर्ण चिंताएं व्यक्त की गई हैं। पिछले वर्षों की तुलना में एक बड़े बदलाव के तहत, २०२६ की रिपोर्ट में स्पष्ट रूप से उच्च-स्तरीय भारतीय संस्थाओं के खिलाफ लक्षित प्रतिबंधों की मांग की गई है।
कानून और भीड़ की हिंसा पर बढ़ती चिंताएं
आयोग की 2026 रिपोर्ट का मूल आधार धार्मिक स्वतंत्रता में प्रणालीगत गिरावट को उजागर करना है। रिपोर्ट में कहा गया है, “2025 में, भारत में धार्मिक स्वतंत्रता की स्थिति लगातार बिगड़ती गई क्योंकि सरकार ने धार्मिक अल्पसंख्यक समुदायों और उनके पूजा स्थलों को लक्षित करने वाले नए कानून पेश किए और उन्हें लागू किया।”
आयोग ने उल्लेख किया कि “कई राज्यों ने धर्मांतरण विरोधी कानूनों को पेश करने या उन्हें मजबूत करने का प्रयास किया ताकि कठोर कारावास की सजा को शामिल किया जा सके।” विशेष रूप से, रिपोर्ट में राजस्थान द्वारा अपनाए गए कानून पर प्रकाश डाला गया है, जिसमें धार्मिक धर्मांतरण कराने के लिए आजीवन कारावास की संभावित सजा शामिल है, और जो व्यक्तियों के लिए स्वेच्छा से अपना धर्म बदलने से पहले सरकार को दो महीने की पूर्व-सूचना देना अनिवार्य बनाता है।
इसके अलावा, रिपोर्ट भारतीय अधिकारियों पर गैर-राज्य तत्वों द्वारा की जाने वाली हिंसा को सहन करने का आरोप लगाती है। इसमें स्पष्ट रूप से कहा गया है: “पूरे वर्ष, कई राज्यों में हिंदू राष्ट्रवादी भीड़ ने मुसलमानों और ईसाइयों को दंडमुक्ति के साथ परेशान किया, भड़काया और उनके खिलाफ हिंसा को उकसाया।” रिपोर्ट में ओडिशा में हुए दंगों जैसी घटनाओं का हवाला दिया गया है, जो विश्व हिंदू परिषद के नेतृत्व वाले विरोध प्रदर्शनों के दौरान अधिकारियों द्वारा कुरान के अपमान की अफवाहों से भड़के थे, जिसके परिणामस्वरूप लोगों को चोटें आईं और कर्फ्यू लगाना पड़ा।
निष्कासन, हिरासत और चरमपंथी हमले
आयोग ने धार्मिक शरणार्थियों और अल्पसंख्यक नागरिकों के खिलाफ की गई कठोर कार्रवाइयों का दस्तावेजीकरण किया है। पैनल का कहना है कि “भारतीय अधिकारियों ने नागरिकों और धार्मिक शरणार्थियों को बड़े पैमाने पर हिरासत में लेने और उनके अवैध निष्कासन में भी सुविधा प्रदान की।”
रिपोर्ट में दर्ज प्रमुख घटनाओं में शामिल हैं:
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रोहिंग्या शरणार्थियों का निष्कासन: मई 2025 में, कथित तौर पर भारतीय अधिकारियों ने 15 ईसाइयों सहित 40 रोहिंग्या शरणार्थियों को हिरासत में लिया, उन्हें बर्मा के तट के पास अंतरराष्ट्रीय जलक्षेत्र में पहुँचाया, और “उन्हें केवल जीवन रक्षक जैकेट के साथ तैरकर बर्मी तट तक जाने के लिए मजबूर किया।”
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असम से निर्वासन: जुलाई 2025 में, अधिकारियों ने असम से सैकड़ों बंगाली भाषी मुसलमानों को बांग्लादेश निष्कासित कर दिया। रिपोर्ट में उल्लेख किया गया है कि अधिकारियों ने निष्कासित लोगों पर मुस्लिम “घुसपैठिए” होने का आरोप लगाया, जिनसे भारत की राष्ट्रीय पहचान को खतरा है, बावजूद इसके कि उन्होंने भारतीय नागरिक होने का दावा किया था।
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पहलगाम हमला: रिपोर्ट में सांप्रदायिक हिंसा को भी संबोधित किया गया है, जिसमें २२ अप्रैल को जम्मू और कश्मीर के पहलगाम में हुए हमले का जिक्र है। बंदूकधारियों ने मुख्य रूप से हिंदू पर्यटकों पर हमला किया, जिसमें २६ लोग मारे गए, कथित तौर पर पीड़ितों से कलमा पढ़ने की मांग करने के बाद। आयोग का कहना है कि इस क्रूर हमले ने भारत और पाकिस्तान के बीच पांच दिवसीय संघर्ष को जन्म दिया और “भारत में मुस्लिम विरोधी भावनाओं को तेज कर दिया, जिसमें लक्षित हमले भी शामिल हैं।”
पूजा स्थलों और अल्पसंख्यक शिक्षा पर राज्य का नियंत्रण
२०२६ की रिपोर्ट धार्मिक संस्थानों को राज्य के नियंत्रण में लाने के सरकारी प्रयासों पर विशेष ध्यान आकर्षित करती है। यह मई २०२५ में संसद द्वारा पारित विवादास्पद वक्फ विधेयक पर प्रकाश डालती है, जिसने मस्जिदों, मदरसों और कब्रिस्तानों जैसे इस्लामी बंदोबस्तों के प्रबंधन वाले बोर्डों में गैर-मुस्लिमों को शामिल करना अनिवार्य कर दिया। इस विधेयक के पारित होने से पश्चिम बंगाल में घातक विरोध प्रदर्शन हुए।
इसके अतिरिक्त, रिपोर्ट सितंबर २०२५ में पारित उत्तराखंड राज्य अल्पसंख्यक शिक्षा प्राधिकरण अधिनियम को भी चिह्नित करती है, जिसने मदरसा बोर्ड को भंग कर दिया और मुसलमानों, सिखों, बौद्धों, जैनियों, पारसियों और ईसाइयों के लिए शैक्षणिक संस्थानों को सख्त राज्य निगरानी में रख दिया।
अमेरिकी सरकार के लिए प्रमुख नीतिगत सिफारिशें
इन निष्कर्षों के आधार पर, आयोग ने ट्रंप प्रशासन और अमेरिकी संसद को मजबूत और सख्त नीतिगत सिफारिशें जारी की हैं। पैनल अमेरिकी सरकार से निम्नलिखित आग्रह करता है:
1. भारत को विशेष चिंता वाला देश नामित करें: अंतर्राष्ट्रीय धार्मिक स्वतंत्रता अधिनियम के तहत औपचारिक रूप से भारत को “विशेष चिंता वाले देश” के रूप में मान्यता दें।
2. लक्षित प्रतिबंध लगाएं: रिपोर्ट ने यह असाधारण कदम उठाते हुए सिफारिश की है कि अमेरिकी सरकार “धार्मिक स्वतंत्रता के गंभीर उल्लंघनों के लिए जिम्मेदारी और सहिष्णुता के लिए भारत की अनुसंधान और विश्लेषण विंग (खुफिया एजेंसी) और राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ जैसी संस्थाओं और व्यक्तियों पर लक्षित प्रतिबंध लगाए, जिसके तहत उनकी संपत्ति को जब्त किया जाए और/या अमेरिका में उनके प्रवेश पर रोक लगाई जाए।”
3. हथियारों की बिक्री रोकें: आयोग ने अमेरिका को सलाह दी है कि “अमेरिकी नागरिकों और धार्मिक अल्पसंख्यकों के खिलाफ लगातार डराने-धमकाने और उत्पीड़न की घटनाओं के आधार पर भारत को हथियारों की बिक्री रोकने के लिए हथियार निर्यात नियंत्रण अधिनियम की धारा 6 को लागू करें।”
4. देश के भीतर आकलन की मांग: भारत सरकार पर दबाव डालें कि वह आयोग और विदेश विभाग सहित अमेरिकी संस्थाओं को भारत में धार्मिक स्वतंत्रता की स्थिति का जमीनी आकलन करने की अनुमति दे।
5. अंतर्राष्ट्रीय दमन को संबोधित करें: रिपोर्ट अमेरिकी संसद से अंतर्राष्ट्रीय दमन रिपोर्टिंग अधिनियम 2024को फिर से पेश करने और पारित करने का आग्रह करती है, जिसमें अमेरिकी धरती पर धार्मिक अल्पसंख्यकों को निशाना बनाकर भारत सरकार द्वारा किए गए अंतरराष्ट्रीय दमन के कृत्यों पर वार्षिक रिपोर्टिंग अनिवार्य हो।
उल्लेखनीय है कि आयोग की 2026 की वार्षिक रिपोर्ट जारी होने के बाद, भारत के विदेश मंत्रालय ने इन निष्कर्षों को स्पष्ट रूप से खारिज कर दिया है। आधिकारिक प्रवक्ता ने इस आकलन को भारत का एक “प्रेरित और पक्षपाती चित्रण” बताते हुए खारिज किया, जो “वस्तुनिष्ठ तथ्यों के बजाय वैचारिक आख्यानों” पर आधारित है।
